मरुस्थलीकरण के बढ़ते खतरे के खिलाफ वैश्विक चेतना का दिवस
धरती की उर्वरता बचाने, जल संकट रोकने और भविष्य सुरक्षित करने का संकल्प लेने का अवसर
प्रकाश चंद्र शर्मा,वरिष्ठ पत्रकार
हर वर्ष 17 जून को विश्वभर में विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस मनाया जाता है। यह दिवस भूमि क्षरण, मरुस्थलीकरण और सूखे जैसी गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रति लोगों को जागरूक करने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए प्रेरित करने का महत्वपूर्ण अवसर है। तेजी से बढ़ती आबादी, अनियोजित विकास, वनों की कटाई, भूजल के अंधाधुंध दोहन और जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के अनेक हिस्सों में उपजाऊ भूमि तेजी से बंजर होती जा रही है। ऐसे में यह दिवस धरती को बचाने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी निभाने का संदेश देता है।
*संयुक्त राष्ट्र की पहल से हुई शुरुआत:*
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1994 में संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD) को अपनाने के बाद 17 जून को इस दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। तब से हर वर्ष विभिन्न देशों में जागरूकता अभियान, संगोष्ठियां, वृक्षारोपण कार्यक्रम और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी अनेक गतिविधियां आयोजित की जाती हैं।
*क्या है मरुस्थलीकरण?*
ये खबर भी पढ़े : बैतूल में राष्ट्रपति के प्रस्तावित दौरे से पहले होगी ट्रायल लैंडिंग व कारकेड रिहर्सलमरुस्थलीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे अपनी उत्पादक क्षमता खोकर बंजर क्षेत्र में परिवर्तित होने लगती है। यह समस्या केवल रेगिस्तानी इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि किसी भी क्षेत्र की भूमि अत्यधिक दोहन, जल की कमी, मिट्टी के कटाव और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार भूमि की गुणवत्ता में गिरावट आने से कृषि उत्पादन घटता है, जैव विविधता प्रभावित होती है और लाखों लोगों की आजीविका संकट में पड़ जाती है। सूखे की बढ़ती घटनाएं इस समस्या को और गंभीर बना रही हैं।
*भूमि क्षरण और जल संकट बना वैश्विक चुनौती:*
दुनिया भर में करोड़ों हेक्टेयर भूमि हर वर्ष क्षरण का शिकार हो रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा चक्र में बदलाव, बढ़ता तापमान और लंबे समय तक पड़ने वाला सूखा कृषि एवं जल संसाधनों पर भारी दबाव बना रहा है। इसका सीधा असर खाद्य सुरक्षा, पेयजल उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में भी भूमि क्षरण और जल संकट गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। कई राज्यों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, जबकि मिट्टी की उर्वरता में कमी किसानों की परेशानियां बढ़ा रही है।
*भूमि संरक्षण: सतत विकास की आधारशिला:*
भूमि केवल खेती का साधन नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण, जैव विविधता और मानव जीवन का आधार है। स्वस्थ भूमि वातावरण में कार्बन को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए भूमि संरक्षण पर्यावरणीय ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक विकास का भी महत्वपूर्ण विषय है।
*समाधान की दिशा में सामूहिक प्रयास जरूरी:*
मरुस्थलीकरण और सूखे की चुनौती से निपटने के लिए वृक्षारोपण, वर्षा जल संचयन, जल का विवेकपूर्ण उपयोग, मिट्टी संरक्षण तकनीकों को अपनाने और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है। साथ ही स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार भी बेहद महत्वपूर्ण है।
*धरती बचाने का संकल्प लेने का दिन:*
विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए चेतावनी और संकल्प का अवसर है। यदि आज भूमि, जल और पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में मानवता को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए इस दिवस का संदेश स्पष्ट है—
“भूमि बचाएं, जल बचाएं और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित बनाएं।”
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लेखक के बारे में
पत्रकारिता में 35 वर्षों से सक्रिय प्रकाश चंद्र शर्मा एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य कर रहे हैं। राजस्थान के जयपुर से रिपोर्टिंग करते हुए वह ‘तरुणमित्र’ के साथ भी जुड़े हुए हैं और समाचार लेखन व कवरेज में योगदान दे रहे हैं।
