सिर्फ धुआँ नहीं, मौसम भी बढ़ा रहा शहरों की हवा में ज़हर

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नई दिल्ली। भारत के बड़े शहरों में बढ़ते प्रदूषण को अक्सर सिर्फ उत्सर्जन का नतीजा माना जाता है। गाड़ियों का धुआँ, उद्योगों का धुआँ, कूड़ा जलाना। मगर एक नई स्टडी बताती है कि कहानी इससे कहीं ज़्यादा जटिल है।

दरअसल कई शहरों में हवा की गुणवत्ता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कितना प्रदूषण निकल रहा है। यह भी उतना ही अहम है कि मौसम उसे फैलने देता है या शहर के ऊपर ही रोक कर रखता है।

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पर्यावरण शोध संस्था Climate Trends की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम की स्थितियाँ अपने आप में प्रदूषण के स्तर को 40 प्रतिशत तक ऊपर-नीचे कर सकती हैं, भले ही उत्सर्जन में कोई बदलाव न हुआ हो। यह विश्लेषण 2024 से 2025 के बीच केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के वायु गुणवत्ता आंकड़ों के आधार पर किया गया है।

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रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई शहरों में प्रदूषण का असली संकट उत्सर्जन और मौसम के आपसी मेल से बनता है। खासकर तब, जब हवा की रफ्तार बेहद कम होती है और नमी अधिक होती है। ऐसी स्थिति में वातावरण में ठहराव पैदा हो जाता है, जिससे प्रदूषक कण शहर के ऊपर ही जमा होने लगते हैं।

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दिल्ली में सर्दियों की घुटन
अध्ययन के मुताबिक दिल्ली देश का सबसे गंभीर वायु प्रदूषण संकट झेलने वाला शहर बना हुआ है। यहां सालाना औसत PM2.5 स्तर सबसे अधिक दर्ज किए गए हैं।

सर्दियों में हालात और भी खराब हो जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार सर्दियों के दौरान दिल्ली में एक भी “क्लीन एयर डे” दर्ज नहीं हुआ। यही वजह है कि साल भर के औसत आंकड़े कभी-कभी सुधार दिखाते हैं, लेकिन नागरिकों को असली राहत महसूस नहीं होती।

रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली और पटना जैसे शहरों में सर्दियों के दौरान 70 प्रतिशत से अधिक दिनों में कम हवा और ज्यादा नमी वाली मौसम स्थितियाँ बनती हैं। यही ठहराव प्रदूषण को लंबे समय तक हवा में बनाए रखता है।

Climate Trends की संस्थापक और निदेशक आरती खोसला कहती हैं कि “अगर सालाना PM2.5 में 20 से 30 प्रतिशत की कमी भी आती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि सर्दियों में हवा सुरक्षित हो गई है। दिल्ली और पटना जैसे शहरों में मौसम की वजह से प्रदूषण लंबे समय तक जमा रहता है। इसलिए आने वाले एनकैप चरण में मौसम को ध्यान में रखकर लक्ष्य तय करना जरूरी है।”

पटना की गहराती समस्या
अध्ययन में यह भी सामने आया कि पटना देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर बन चुका है। यहां भी प्रदूषण का स्तर लगातार ऊंचा बना रहता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, गंगा के मैदानों में स्थित कई शहरों में हवा का प्रवाह सीमित होता है। ऐसे में प्रदूषण फैलने के बजाय शहर के ऊपर ही अटक जाता है।

दक्षिण के शहरों में नया खतरा
रिपोर्ट एक और दिलचस्प बदलाव की ओर इशारा करती है।
परंपरागत रूप से अपेक्षाकृत साफ माने जाने वाले बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में भी अब सर्दियों के महीनों में हवा की गुणवत्ता बिगड़ने के संकेत मिलने लगे हैं। यह एक नया ट्रेंड माना जा रहा है।

इसके अलावा मुंबई और चेन्नई में 2025 के दौरान सालाना औसत प्रदूषण स्तर में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो इस बात का संकेत है कि प्रदूषण अब सिर्फ कुछ महीनों की समस्या नहीं रह गया है।

दिलचस्प बात यह है कि बड़े शहरों में बेंगलुरु अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में दिखाई देता है। रिपोर्ट के अनुसार वहां हवा की गुणवत्ता अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है, जिसे शोधकर्ता “संरचनात्मक वायु गुणवत्ता सहनशीलता” कहते हैं।

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‘तरुणमित्र’ श्रम ही आधार, सिर्फ खबरों से सरोकार। के तर्ज पर प्रकाशित होने वाला ऐसा समचाार पत्र है जो वर्ष 1978 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जैसे सुविधाविहीन शहर से स्व0 समूह सम्पादक कैलाशनाथ के श्रम के बदौलत प्रकाशित होकर आज पांच प्रदेश (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तराखण्ड) तक अपनी पहुंच बना चुका है। 

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