न्याय को 40 साल का इंतजार, व्यवस्था पर सुप्रीम प्रहार, हाईकोर्ट से मांगा जवाब

चार दशक बाद सुनी गई हत्या के मामले की अपील, सुप्रीम कोर्ट बोला-यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल

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नीरज अवस्थी

  • लंबित आपराधिक मामलों पर बढ़ा दबाव
  • पुराने मुकदमों के निस्तारण की नई रणनीति बनाने को कहा, तीन महीने में रिपोर्ट तलब

नई दिल्ली। चार दशक तक  हत्या के मामले की अपील का अदालत में लंबित रहना केवल एक मुकदमे की देरी नहीं, बल्कि देश की न्यायिक व्यवस्था के सामने खड़ी उस गंभीर चुनौती का आईना है, जिसमें समय पर न्याय देना सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में 40 वर्ष से अधिक समय तक लंबित रही एक आपराधिक अपील को लेकर कड़ी नाराजगी जताई और स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

8 जून 2026 को न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि किसी व्यक्ति को अपनी अपील पर फैसला पाने के लिए चार दशक तक इंतजार करना पड़े तो न्याय का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। अदालत ने इसे अपवाद नहीं बल्कि लंबित मामलों की समस्या का गंभीर संकेत माना और कहा कि अब केवल चिंता जताने का नहीं, बल्कि ठोस समाधान लागू करने का समय आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से लंबित आपराधिक अपीलों के निस्तारण की स्पष्ट कार्ययोजना प्रस्तुत करने को कहा।
मामला कानपुर निवासी विजय सिंह से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 1983 में अपने भाई की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। निचली अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसके खिलाफ उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की। यह अपील वर्षों तक लंबित रही और आखिरकार चार दशक बाद उस पर फैसला आया। इस असाधारण देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का इतना लंबा खिंचना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।

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सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह सुझाव भी रखा गया कि 30 वर्ष से अधिक समय से लंबित अभियोजन अपीलों को समाप्त कर बैकलॉग कम किया जा सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस सुझाव को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल लंबित होने के आधार पर किसी मामले को खत्म करना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा। अदालत का दायित्व मामलों का निष्पक्ष निर्णय करना है, न कि लंबित मामलों की संख्या घटाने के लिए उन्हें समाप्त कर देना।

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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से 30 वर्ष से अधिक समय से लंबित आपराधिक अपीलों का विस्तृत विवरण, देरी के कारण और उनके शीघ्र निस्तारण के लिए अपनाए जाने वाले उपायों की जानकारी मांगी। अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए समयसीमा भी तय की ताकि केवल औपचारिक जवाब न देकर व्यावहारिक सुधारों की दिशा में कदम उठाए जाएं।

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यह मामला केवल विजय सिंह की अपील तक सीमित नहीं है। इसने देश की न्यायिक व्यवस्था में वर्षों से लंबित लाखों मामलों, न्यायाधीशों के रिक्त पदों, सीमित संसाधनों और बढ़ते मुकदमों की चुनौती को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है कि न्याय में अनावश्यक देरी केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत नागरिकों के त्वरित न्याय के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।

इस आदेश के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या न्यायपालिका लंबित मामलों के पहाड़ को कम करने के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित कर पाएगी, जिससे आने वाली पीढ़ियों को किसी फैसले के लिए चार दशक तक इंतजार न करना पड़े। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक केस की सुनवाई नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र के लिए आत्ममंथन और सुधार का स्पष्ट संदेश मानी जा रही है।

लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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