रामनामी समाज का परमार्थ निकेतन आगमन, गंगा आरती में दिया आध्यात्मिक संदेश

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ऋषिकेश, उत्तराखण्ड। भारत की आध्यात्मिक भूमि सदैव उन परम्पराओं की जननी रही है, जिन्होंने जीवन को केवल जीने का नहीं, बल्कि उसे साधना और समर्पण का माध्यम बनाने का संदेश दिया है। ऐसी ही एक अद्वितीय परम्परा के प्रतिनिधि, छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज के श्रद्धालुओं का आगमन परमार्थ निकेतन में हुआ, जहाँ उन्होंने परमार्थ निकेतन के पीठाधीश्वर, स्वामी चिदानन्द सरस्वती से भेंट कर उनके पावन सान्निध्य में विश्वविख्यात परमार्थ गंगा आरती में सहभाग कर आध्यात्मिक एकता का अनुपम संदेश दिया।

इस विशेष अवसर पर श्रीराम कथा व्यास पूज्य संत मुरलीधर जी, साध्वी भगवती सरस्वती , बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष श्री हेमन्त द्विवेदी जी एवं ऋषिकेश के मेयर शंभू पासवान की गरिमामयी उपस्थिति रही। रामनामी समाज केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि भक्ति की वह जीवंत धारा है जिसने अपने जीवन को राममय बना दिया है। विश्व में ऐसे उदाहरण विरले ही मिलते हैं जहाँ लोग अपने शरीर को ईश्वर के नाम का मंदिर बना दें। रामनामी समाज के श्रद्धालुओं ने अपने तन पर ’राम’ अंकित कर यह उद्घोष किया है कि जब ईश्वर हृदय में बसते हैं, तब उनका नाम जीवन के प्रत्येक आयाम में प्रकट होना चाहिए।

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स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने रामनामी समाज के प्रतिनिधियों को रूद्राक्ष का पौधा उपहार स्वरूप भेंट कर कहा कि श्रीराम, जीवन की मर्यादा, करुणा, सत्य और लोककल्याण की प्रेरणा हैं। जिन लोगों ने अपने तन और मन दोनों पर राम को धारण किया है, वे वास्तव में उस आध्यात्मिक संदेश के जीवंत वाहक हैं जिसकी आज सम्पूर्ण विश्व को आवश्यकता है।

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रामनामी समाज भारत की आध्यात्मिक विरासत का एक अनमोल अध्याय है। विश्व इतिहास में ऐसे उदाहरण अत्यंत दुर्लभ हैं जहाँ किसी समुदाय ने अपने सम्पूर्ण शरीर को ईश्वर के नाम से अलंकृत कर दिया। रामनामी समाज का प्रत्येक अंकित राम मानवता, समानता, भक्ति और आत्मगौरव का संदेश देता है।

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आज जब विश्व अपनी सांस्कृतिक जड़ों और आध्यात्मिक मूल्यों की पुनः खोज कर रहा है, तब रामनामी समाज सम्पूर्ण मानवता के समक्ष एक जीवंत प्रेरणा है। रामनामी समाज वास्तव में भारत की लोकआस्था, आध्यात्मिक लोकतंत्र और सनातन चेतना का अद्वितीय प्रकाशस्तंभ है।

आज जब विश्व पहचान के संकट, सांस्कृतिक विखंडन और आन्तरिक अशांति से जूझ रहा है, तब रामनामी समाज हमें एक अद्भुत संदेश देता है कि उन्होंने किसी ग्रन्थ में नहीं, किसी मंच पर नहीं, बल्कि अपने जीवन पर राम का नाम लिख दिया। रामनामी समाज की परम्परा मानव इतिहास की उन दुर्लभ आध्यात्मिक विरासतों में से है जो जीवन की दिव्यता का संदेश देती है।

आज आवश्यकता है कि ऐसी विलक्षण परम्पराओं को केवल इतिहास या लोककथाओं तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें विश्व मंच पर सम्मानपूर्वक प्रस्तुत किया जाये। रामनामी समाज हमें स्मरण कराता है कि भक्ति किसी भाषा, वेशभूषा या भौगोलिक सीमा की मोहताज नहीं होती। सच्ची भक्ति वह है जो हमें विनम्र, करुणामय और आत्मिक रूप से समृद्ध बनाती है। स्वामी ने सभी विभूतियों को रूद्राक्ष का पौधा भेंट कर पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रेरित किया।

लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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