श्रद्धांजलि: सियासत की काल कोठरी में उम्मीदों की रौशन मशाल थे स्वo आलमबदी
22 जुलाई को आलमबदी साहब का 90 वर्ष की आयु में निधन
- प्रदेश की 13वीं, 14वीं, 16वीं और 17वीं विधानसभाओं में भी जीत हासिल कर 5 बार बने विधायक
पिछले कई वर्षों से लगभग दस्तूर के तौर पर प्रत्येक माह में दो-तीन बार मुझे फ़ोन पर ढेर सारा प्यार व आशीर्वाद देने वाली महान शख़्सियत आलमबदी आज़मी अब हमारे बीच नहीं रही। गत 22 जुलाई को आलमबदी साहब का 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। समाजवादी पार्टी के टिकट पर 1996 में पहली बार आजमगढ़ की निज़ामाबाद विधानसभा चुनाव क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले आलमबदी ने प्रदेश की 13वीं, 14वीं, 16वीं और 17वीं विधानसभाओं में भी जीत हासिल की और 5 बार विधायक चुने गये।
सुबह सवेरे उठकर समाचार पत्रों का अध्ययन करना और सम्पादकीय आलेख पढ़ना उनकी दिनचर्या में शामिल था। वे मेरे लेख प्रायः विभिन्न अख़बारों में पढ़ा करते थे। मुझे बेटी कहकर संबोधित करते और कहते थे कि मैं आपके आलेख को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराऊंगा। बहुत दुख का विषय है कि इतना प्यार,आशीष व सम्मान देने वाले महान व्यक्ति से मेरी रूबरू मुलाक़ात नहीं हो सकी।
परन्तु उनके देहावसान के बाद पता चला कि वे वास्तव में मेरी कल्पनाओं से भी कहीं अधिक महान शख़्स थे। ख़ासकर आज की रसातल की ओर जाती हुई राजनीति के दौर में भी राजनीति में रहते हुये उनके जीवन के सैकड़ों ऐसे क़िस्से सुनने को मिल रहे हैं जो देश के दंभी,अहंकारी,भ्रष्ट,सत्ता लोलुप,परिवारवादी, साम्प्रदायिकतावादी व जातिवादी राजनीति करने वालों के लिये आदर्श पेश करते हैं। वे नेहरू, बोस, गांधी व लोहिया से प्रेरणा लेकर समाज सेवा में आने वाले महान नेता थे।
उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उनके ताबूत में आगे पीछे 15 -15 फ़ुट के क़रीब 4 बांस इसलिये अलग से जोड़े गये थे ताकि उनके जनाज़े को कांधा देने वाला हर शख़्स उनके जनाज़े को कांधा देकर अपने लोकप्रिय नेता को अंतिम बिदाई दे सके। आलमबदी आज़मी का जन्म 16 मार्च 1936 को आज़मगढ़ ज़िले के बिंदावल में वदीउज़्ज़मां आज़मी के घर हुआ था। वे पेशे से इंजीनियर थे। वे एक ऐसे नेता थे जिन पर पूरा जीवन भ्रष्टाचार या रिश्वत का एक भी दाग़ नहीं लगा।
पांच बार के विधायक होने के बावजूद भी ना ही वे गाड़ियों का क़ाफ़िला लेकर चलना पसंद करते ना ही आजतक उन्होंने अपना कोई बड़ा या नया मकान बनवाया। उनका पूरा जीवन एक साधारण इंसान की तरह गुज़रा। वैसे तो वे इंजीनियर के रूप में नौकरी करते थे। परन्तु 1970-90 के दशक के मध्य जब कभी घर आते तो इलाक़े में बुनियादी सुविधाओं का अभाव देखकर दुखी होते। क्या बिजली क्या सड़कें क्या स्वास्थ्य सेवाएं तो क्या शिक्षा व्यवस्था व शिक्षा सुविधायें इन सब की दयनीय हालत को देखकर दुखी होते। आख़िरकार इनमें सुधार लाने की ग़रज़ से ही उन्होंने इन बुनियादी मुद्दों को लेकर स्थानीय स्तर पर आवाज़ उठानी शुरू की। उनके इसी अध्ययनशील और गंभीर स्वभाव ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बना दिया।
1996 में मुलायम सिंह यादव ने पहली बार उन्हें लखनऊ बुलाकर समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने का आग्रह किया। इसी चुनाव के दौरान मुलायम सिंह यादव ने चुनावी ख़र्च हेतु उन्हें उस समय 5 लाख रूपये भेजे। आलमबदी साहब ने यह कहकर उन पैसों को वापस कर दिया कि 'आलमबदी चुनाव लड़ रहा है कोई धंधा नहीं कर रहा है,मुझे नोटों की नहीं बल्कि जनता की दुआओं की ज़रुरत है'। इस बात पर मुलायम यादव ने भी गर्व महसूस करते हुये कहा कि आज राजनीति में ऐसे ही समर्पित व ईमानदार लोगों की ज़रुरत है। उधर यह ख़बर जब आलमबदी साहब के चुनाव क्षेत्र में फैली तो पूरे इलाक़े ने दस,बीस,पचास,सौ यानी जिससे जो हो सकता था चुनाव में खर्च करना शुरू कर दिया और पूरा चुनाव जनता ने अपने ऊपर ले लिया। यह सिलसिला उनके अंतिम चुनाव तक जारी रहा। उनके क्षेत्र की जनता आलमबदी साहब की जीत को अपने स्वाभिमान की जीत समझती थी ।
आलमबदी साहब रोज़ाना सुबह सवेरे उठकर अपने कमरे में खुद अपने हाथों से झाङू लगाते व सफ़ाई करते। उनके घर पर समाजवादी पार्टी का नहीं बल्कि राष्ट्रीय ध्वज लहराता रहता था। सादगी की मिसाल क़ायम करने वाले आलमबदी अपने घर आने वालों को छोटे से कप में बिना दूध की चाय देते और ख़ुद भी हमेशा वही पीते थे। उनके घर में मेहमान की सेवा करने तक के लिये कोई सेवक नहीं था। उनके बेटे और पोते ही मेहमानों की सेवा का काम करते थे। वे हमेशा अपने घर के टीन शेड के नीचे आम लोगों से रूबरू होते थे। 5 बार के इस आदर्श विधायक के पास ढंग की एक कार तक नहीं थी। एक पुरानी एम्बेसडर कार थी जिसे पूरा इलाक़ा इसलिये भी पहचनता था क्योंकि वह अक्सर ख़राब होकर या तेल के अभाव में बीच सड़क पर ही खड़ी हो जाती थी।
कुछ समय पूर्व ही शुभचिंतकों के बहुत आग्रह पर उन्होंने एक पुरानी बोलेरो ख़रीदी थी लेकिन उसका भी वे कम ही इस्तेमाल करते थे। कभी वे किसी कार्यकर्ता की गाड़ी में बैठकर जनसेवा के मिशन पर निकल जाते या फिर सड़क पर जो भी मिल जाता उससे ही लिफ़्ट ले लिया करते थे। विधानसभा सत्र के दौरान लखनऊ जाने के लिए वो यूपी रोडवेज़ की बस में अपने 'विधायक पास' का इस्तेमाल किया करते थे।
वे कभी भी 20 /30 रूपये मीटर से मंहगा कपड़ा नहीं पहनते थे। अपने कपड़े ख़ुद धोते थे। कीपैड वाला सस्ता व मामूली सा मोबाईल इस्तेमाल करते थे। कभी स्कूटर कभी ऑटो तो कभी बस से यात्रा करते थे। मुलायम व अखिलेश दोनों ही की ओर से उन्हें मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया गया परन्तु उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि ' किसी नैजवान को मंत्री बनाइये' । कई ऐसे अवसर भी आये जबकि सत्ता में होने के बावजूद वे जनता के साथ सरकार व सत्ता विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेते नज़र आये। उनका स्पष्ट मानना था कि जनता बड़ी होती है पार्टी या सरकार नहीं। उनके पूरे इलाक़े में भ्रष्ट ठेकेदार काम करने से घबराते थे क्योंकि वे स्वयं प्रत्येक सामग्री की गुणवत्ता चेक किया करते थे। इलाक़े के किसी भी सरकारी निर्माण कार्य में कमीशन,चोरी, मिलावटख़ोरी या भ्रष्टाचार की गुंजाईश नहीं थी।
बताया जाता है कि 2014 के चुनाव में कार्यकर्ताओं की एक बैठक में जब अधिकांश चापलूस कार्यकर्ता व नेता मुलायम यादव को उनकी जीत का आश्वासन दे रहे थे उस समय अकेले आलमबदी साहब ही थे जिन्होंने मुलायम से कहा था कि आप इन चापलूसों पर भरोसा करेंगे तो चुनाव हार जायेंगे। आलमबदी साहब जनता की समस्याओं को अपनी व अपने परिवार के सदस्य की समस्याओं की तरह सुनते थे। चुनाव प्रचार में उनकी सादगी व ख़ामोशी देखकर लोग पूछ बैठते कि आप इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं क्या ? उनका जवाब होता जनता लड़ रही है मैं नहीं।
पूरा क्षेत्र क्या हिन्दू तो क्या मुस्लिम ख़ुद ही चुनाव प्रचार करता अपनी साइकिल स्कूटर बाइक का प्रयोग करता ख़ुद तेल डलवाता और इनके लिए वोट मांगता। जनता कहती जब उनका जीवन उनकी सेवाएं हमारे लिए हैं तो चुनाव भी हमें ही लड़ना है। अफ़सोस कि उस अज़ीम शख़्सियत की दुआओं से भरी फ़ोन कॉल अब कभी नहीं सुनाई देगी। निह संदेह स्वo आलमबदी आज़मी साहब वर्तमान सियासत की काल कोठरी में उम्मीदों की रौशन मशाल थे। ईश्वर उन्हें स्वर्ग में ऊँचा स्थान दे और वर्तमान दौर के नेताओं को उनसे सीखने की प्रेरणा दे।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
