सड़क की शोकसभा

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'

सड़क उस दिन गाँव में आई, जिस दिन गाँव का आखिरी बरगद काटा गया था। यह संयोग था या षड्यंत्र, कोई नहीं जानता था। गाँव के बाहर लाल फीता बँधा था, मंच सजा था, नेता जी के स्वागत में माला तैयार थी और लाउडस्पीकर अपनी पूरी ताकत से चिल्ला रहा था कि "विकास आ गया है।" गाँव वाले ताली बजा रहे थे, जैसे किसी बच्चे के जन्म पर खुशियाँ मनाई जाती हैं। मगर उसी भीड़ में एक बूढ़ा बैठा था। नाम था रामसेवक। वह ताली नहीं बजा रहा था। उसकी आँखें सड़क को ऐसे देख रही थीं जैसे कोई आदमी अपनी पत्नी के दूसरे विवाह में शामिल हो गया हो। सरपंच ने टोका, "काका, खुश नहीं हो क्या?" रामसेवक हँसा। वह हँसी वैसी थी जैसी किसी गरीब की जेब में पड़े आखिरी सिक्के की खनक होती है। 

उसने कहा, "खुश हूँ बेटा। बस सोच रहा हूँ कि यह सड़क आई है या मृत्यु प्रमाणपत्र।" लोग हँस पड़े। गाँव में अब हर दुख चुटकुला बन जाता था। नेता जी बोले, "अब शहर तुम्हारे दरवाजे पर होगा।" रामसेवक बुदबुदाया, "दरवाजे पर शहर होगा तो घर में गाँव कहाँ रहेगा?" किसी ने नहीं सुना। सुन भी लेते तो समझते नहीं। विकास के भाषण में समझदारी सबसे पहले मरती है। फीता कट गया। तालियाँ बज गईं। फोटो खिंच गए। सड़क चुपचाप खड़ी रही। उसे शायद पता था कि वह जिस गाँव में आई है, वहाँ लोग नहीं, उनकी परछाइयाँ बची हैं। उसी रात रामसेवक ने सपना देखा। सड़क उसके आँगन में बैठी रो रही है। उसने पूछा, "काहे रो रही हो बिटिया?" सड़क बोली, "मुझे सब बधाई दे रहे हैं, लेकिन कोई यह नहीं बता रहा कि मैं इतनी देर से क्यों पहुँची।" रामसेवक की आँख खुल गई। बाहर सन्नाटा था। मगर उसे लगा, कहीं कोई सचमुच रो रहा है।

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अगले दिन से गाँव का मेला शुरू हो गया। जमीनों के भाव बढ़ गए। दलाल ऐसे घूमने लगे जैसे गिद्ध किसी घायल जानवर के ऊपर मंडराते हैं। जिन खेतों में कभी गेहूँ झूमता था, वहाँ नक्शे झूमने लगे। एक दिन रामसेवक का बेटा राघव शहर से आया। बड़ी कार में। चमकदार कपड़े पहने। उसने कहा, "बाबा, खेत बेच दो। यहाँ अब कुछ नहीं रखा।" रामसेवक ने पूछा, "और तुम्हारा बचपन?" राघव हँस पड़ा। "बचपन से बैंक बैलेंस नहीं बनता बाबा।" इतना सुनना था कि  रामसेवक को लगा जैसे किसी ने उसकी छाती पर हल चला दिया हो। वह बोला, "जिस मिट्टी ने तुझे चलना सिखाया, तू उसी को बेचने आया है?" राघव ने मोबाइल देखते हुए कहा, "भाव अच्छा मिल रहा है।" चौपाल पर बैठे बुजुर्गों ने सुना तो बोले, "समय बदल गया है।" रामसेवक ने कहा, "नहीं, समय नहीं बदला। आदमी ने अपना पता बदल लिया है।" उसी शाम सड़क के किनारे बैठे हुए उसने देखा कि गाँव के तीन और लड़के शहर जा रहे हैं। उनकी माताएँ रो रही थीं। लड़के हँस रहे थे। शहर हमेशा हँसते हुए बुलाता है और रुलाते हुए छोड़ता है। मगर यह बात पोस्टरों पर नहीं लिखी जाती। रात को फिर सड़क उसके सपने में आई। इस बार उसने पूछा, "तुम मुझे ऐसे क्यों देखती हो?" सड़क बोली, "मैं अपराधी हूँ।" रामसेवक चौंका। "किस बात की?" सड़क बोली, "लोग समझते हैं मैं उन्हें शहर तक ले जाती हूँ। सच यह है कि मैं उन्हें गाँव से दूर ले जाती हूँ।" रामसेवक जाग गया। उसकी आँखें भीगी हुई थीं। बाहर नई सड़क चाँदनी में चमक रही थी। मगर उसे पहली बार वह सड़क नहीं, कफन लगी।

महीने बीतते गए। गाँव में मकान बढ़ते गए, घर घटते गए। बिजली के खंभे खड़े हो गए, लेकिन चौपाल बैठ गई। मोबाइल के टावर उठ गए, लेकिन रिश्तों के सिग्नल गायब हो गए। रामसेवक रोज देखता कि कैसे गाँव अपने ही शरीर से कटता जा रहा है। एक दिन उसने देखा कि स्कूल बंद हो गया। बच्चों की संख्या कम हो गई थी। मास्टर साहब शहर चले गए। अगले महीने डाकघर बंद हो गया। फिर कुम्हार ने चाक बेच दिया। फिर लोहार ने भट्ठी बुझा दी। हर बार गाँव थोड़ा और मर जाता। मगर मौत की कोई शोकसभा नहीं होती थी। क्योंकि मौत धीरे धीरे आ रही थी। जैसे दीमक आती है। एक दिन रामसेवक ने सड़क से कहा, "तू जानती है, तू किस जैसी लगती है?" सड़क चुप रही। वह बोला, "तू उस बेटे जैसी लगती है जो बाप की चिता ठंडी होने के बाद डॉक्टर लेकर पहुँचे।" सड़क काँप गई। हवा भी चुप हो गई। उसी समय गाँव के कुछ लड़के हँसते हुए निकले। उनमें से एक बोला, "काका, अब तो गाँव स्मार्ट हो गया।" रामसेवक ने पूछा, "स्मार्ट?" लड़का बोला, "हाँ।" रामसेवक मुस्कुराया। "जिस घर में माँ अकेली रोती हो, उसे स्मार्ट नहीं, अनाथ कहते हैं बेटा।" लड़का चला गया। उसे बात समझ नहीं आई। सच हमेशा देर से समझ आता है। कभी कभी इतना देर से कि उसके समझ आने तक सब कुछ खत्म हो चुका होता है।

फिर एक दिन रामसेवक अचानक गायब हो गया। सुबह उसकी चारपाई खाली मिली। लाठी नहीं थी। चप्पल नहीं थी। आदमी जैसे हवा में घुल गया हो। पूरा गाँव खोजता रहा। कुएँ में देखा। खेतों में देखा। मंदिर में देखा। कहीं नहीं मिला। पुलिस आई। रिपोर्ट लिखी गई। कुछ लोगों ने कहा, "बूढ़ा पागल था। कहीं चला गया होगा।" कुछ बोले, "शायद मर गया।" लेकिन लाश नहीं मिली। सड़क हर दिन पहले की तरह शांत खड़ी रही। जैसे उसे कुछ पता ही न हो। साल भर बीत गया। धीरे धीरे लोग रामसेवक को भूल गए। आदमी मरता नहीं है, भुला दिया जाता है। यही उसकी असली मृत्यु होती है। इस बीच गाँव पूरी तरह बदल गया। खेतों की जगह प्लॉट हो गए। पोखर की जगह कॉम्प्लेक्स बन गया। बरगद की जगह पेट्रोल पंप खड़ा हो गया। गाँव का नाम अब शहर की कॉलोनी जैसा लगने लगा था। एक दिन उसी सड़क पर एक बड़ा समारोह रखा गया। गाँव को आदर्श विकास पुरस्कार मिलने वाला था। मंच सज गया। अधिकारी आए। भाषण शुरू हुए। सब लोग खुश थे। तभी भीड़ में से एक बूढ़ी औरत उठी। वह रामसेवक की पत्नी थी। उसकी आँखें सूख चुकी थीं। आँसू शायद वर्षों पहले खत्म हो गए थे। उसने माइक छीन लिया। पूरा मैदान सन्नाटे में डूब गया।

वह काँपती आवाज में बोली, "तुम लोग विकास का जश्न मना रहे हो। अच्छा है। मगर पहले मुझे मेरे आदमी का पता बता दो।" अधिकारी असहज हो गए। सरपंच ने उसे बैठाने की कोशिश की। मगर वह नहीं बैठी। उसने सड़क की तरफ उँगली उठाई और बोली, "वह यहीं है।" लोग चौंक गए। "कहाँ?" उसने कहा, "यहीं। इसी सड़क में।" भीड़ में खुसरपुसर शुरू हो गई। बूढ़ी औरत रोने लगी। "जिस दिन सड़क बन रही थी, रामसेवक मजदूरों के साथ काम कर रहा था। वह कहता था कि यह सड़क मेरे गाँव को खा जाएगी, इसलिए मैं इसे अपनी आँखों के सामने बनते देखूँगा। आखिरी दिन मशीन से दुर्घटना हुई। उसका शरीर बुरी तरह कुचल गया। ठेकेदार डर गया। काम रुक जाता, जाँच बैठ जाती। इसलिए रात में उसकी लाश सड़क की नींव में दबा दी गई। मुझे धमका दिया गया। कहा गया कि चुप रहो, नहीं तो मुआवजा भी नहीं मिलेगा। मैं चुप रही। क्योंकि गरीब की आवाज सबसे सस्ती चीज होती है।"

पूरा मैदान पत्थर हो गया। किसी के पास शब्द नहीं थे। सड़क अब भी वहीं थी। मगर अचानक उसकी चमक बदल गई। लोगों को लगा जैसे डामर नहीं, किसी बूढ़े किसान का खून चमक रहा हो। किसी ने पहली बार सड़क को गौर से देखा। उसे लगा जैसे वह सड़क नहीं, एक लंबी कब्र है।

उस रात गाँव में कोई नहीं सोया। लोग सड़क पर चलते और रो पड़ते। उन्हें हर कदम पर रामसेवक की आवाज सुनाई देती। "सड़क कभी अकेली नहीं आती रे।"

अगली सुबह प्रशासन ने सड़क की खुदाई शुरू की। सबको यकीन था कि नीचे रामसेवक का कंकाल मिलेगा।

लेकिन जब सड़क टूटी, तब नीचे कोई लाश नहीं मिली।

सिर्फ एक पुराना लकड़ी का बोर्ड मिला।

उस पर धुँधले अक्षरों में लिखा था।

"यहाँ कभी एक गाँव हुआ करता था।"

बस इतना ही।

न रामसेवक मिला।

न उसकी हड्डियाँ।

न कोई निशान।

लोग फूट फूटकर रो पड़े।

क्योंकि उस क्षण उन्हें समझ आया कि सड़क के नीचे दबा हुआ आदमी रामसेवक नहीं था।

सड़क के नीचे पूरा गाँव दबा हुआ था।

रामसेवक तो बस उसका आखिरी गवाह था।

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‘तरुणमित्र’ श्रम ही आधार, सिर्फ खबरों से सरोकार। के तर्ज पर प्रकाशित होने वाला ऐसा समचाार पत्र है जो वर्ष 1978 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जैसे सुविधाविहीन शहर से स्व0 समूह सम्पादक कैलाशनाथ के श्रम के बदौलत प्रकाशित होकर आज पांच प्रदेश (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तराखण्ड) तक अपनी पहुंच बना चुका है। 

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