संपादकीय: शिक्षा में पिछड़ता भारत; क्या भविष्य दांव पर?
भारत और चीन: शिक्षा पर दो अलग दृष्टिकोण
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी है। यह न सिर्फ व्यक्तिगत विकास का आधार बनती है, बल्कि अर्थव्यवस्था, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की रीढ़ भी होती है। हाल के वर्षों में भारत और चीन के शिक्षा बजट की तुलना इस बात को रेखांकित करती है कि प्राथमिकताएं कितनी अलग हो सकती हैं। भारत में शिक्षा पर केंद्रीय बजट का हिस्सा लगातार घट रहा है, जबकि चीन लंबे समय से इसे प्राथमिकता दे रहा है।
इस अंतर का फायदा अंततः किसको मिलेगा और नुकसान किसको उठाना पड़ेगा, यह सवाल आज के भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आंकड़े स्पष्ट हैं। भारत में शिक्षा मंत्रालय का आवंटन कुल केंद्रीय बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी 2013-14 के 4.6 प्रतिशत से घटकर लगभग 2.5-2.6 प्रतिशत रह गई है। केंद्र और राज्य मिलाकर सार्वजनिक शिक्षा खर्च जीडीपी का करीब 4.1 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का लक्ष्य 6 प्रतिशत का है। यह लक्ष्य दशकों से अधूरा है। इसके विपरीत चीन शिक्षा पर जीडीपी का लगभग 4 प्रतिशत या उससे अधिक खर्च बनाए रखता है। 2012 से वह इस स्तर को स्थिर रखे हुए है। उसकी अर्थव्यवस्था भारत से कई गुना बड़ी होने के कारण निरपेक्ष राशि बहुत विशाल हो जाती है सैकड़ों अरब डॉलर।
चीन ने शिक्षा को मानव पूंजी निर्माण का मुख्य औजार बनाया। परिणामस्वरूप वहां साक्षरता, कौशल विकास, विज्ञान-प्रौद्योगिकी और नवाचार में तेज प्रगति हुई। इसका सीधा असर दोनों देशों की भविष्य की संभावनाओं पर पड़ता है। भारत के पास विशाल युवा आबादी है लेकिन जनसांख्यिकीय लाभांश में पिछड़ता दिख रहा है। लेकिन यदि शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच पर्याप्त नहीं बढ़ी तो यह लाभांश बोझ बन सकता है। घटते सापेक्ष बजट का मतलब है कम शिक्षक, कमजोर बुनियादी ढांचा, शोध में कमी और कौशल अंतर।
निजी शिक्षा पर निर्भरता बढ़ रही है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग पर बोझ बढ़ता है। परिणामस्वरूप कुशल कार्यबल की कमी, बेरोजगारी और नवाचार में पिछड़ना, ये भारत के लिए नुकसान के कारण बनते जा रहे हैं। चीन इस निवेश से लाभान्वित हो रहा है। बेहतर शिक्षित और कुशल जनशक्ति ने उसे विनिर्माण, प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थिति दी है। उच्च शिक्षा और अनुसंधान पर फोकस ने पेटेंट, स्टार्टअप और वैज्ञानिक उपलब्धियों में बढ़त दिलाई। जब भारत और चीन दोनों वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, तब शिक्षा में यह अंतर चीन को रणनीतिक लाभ पहुंचाता है।
भारत को यह समझना होगा कि शिक्षा और शोध के बिना कोई देश कभी आगे जा ही नहीं सकता, रही बात आवंटन बढ़ने की तो फिलहाल भारत का रुख शिक्षा के लिये तो सकारात्मक नही दिख रहा है। भले ही स्किल इंडिया, डिजिटल शिक्षा और कुछेक उच्च संस्थानों पर ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन कुल बजट में हिस्सा घटने और जीडीपी के अनुपात में लक्ष्य से दूर रहने का मतलब है कि शिक्षा अभी भी उतनी प्राथमिकता नहीं पा रही जितनी इंफ्रास्ट्रक्चर या अन्य क्षेत्रों को मिल रही है। सड़क परिवहन जैसे क्षेत्रों में बजट हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है, जबकि शिक्षा पीछे रह गई।
संपादकीय दृष्टि से कहना होगा कि शिक्षा बजट घटाना या उसकी प्राथमिकता कम करना भारत के लिए दीर्घकालिक नुकसान है। चीन का बढ़ता और स्थिर निवेश उसे फायदा पहुंचा रहा है। कुशल जनशक्ति, नवाचार और आर्थिक प्रतिस्पर्धा में। भारत को जनसांख्यिकीय लाभांश का पूरा लाभ उठाना है तो शिक्षा को सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि वास्तविक प्राथमिकता में जगह देनी होगी।
6 प्रतिशत जीडीपी का लक्ष्य हासिल करने, गुणवत्ता सुधारने और समान पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा, शिक्षा में यह अंतर भविष्य की दौड़ में भारत को पीछे छोड़ सकता है, जबकि चीन आगे निकलता जाएगा। शिक्षा पर बचत भविष्य पर कर्ज है, यह समझना अब अनिवार्य हो गया है।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
