आज़ादी के आठ दशक बाद भी सस्ता सुलभ न्याय दूर की कौड़ी ?
79 साल बाद भी न्याय की राह कठिन
मनोज कुमार अग्रवाल
संसद में संविधान संविधान चिल्लाने से संविधान नहीं बचेगा यूं तो देश में संविधान की दुहाई हर कोई दे रहा है लेकिन आजादी के 79 साल बाद भी देश की अदालतों से न्याय मिलना टेड़ी खीर है। जब तक अपराध नहीं रूकेगा लोगों को समयबद्ध न्याय नहीं मिलेगा तब तक कानून और संविधान की बात करना महज बेमानी से ज्यादा कुछ नहीं है। भारत में आपराधिक मामलों में सजा मिलने (दोषसिद्धि) की दर लगभग 50 से 54 प्रतिशत है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, अदालतों में सुनवाई पूरी होने के बाद कुल मामलों में से लगभग आधे मामलों में दोषियों को सजा हो पाती है।सजा के आंकड़े और स्थितिऔसत दोषसिद्धि दर: देश में भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज मामलों में सजा का औसत करीब 54% है।चार्जशीट दर: पुलिस द्वारा जांच के बाद लगभग 72% मामलों में अदालत में चार्जशीट दाखिल की जाती है।अपराध के प्रकार: हत्या जैसे मामलों में सजा की दर तुलनात्मक रूप से बेहतर (लगभग 38-42%) होती है, जबकि अन्य कई मामलों में यह अलग-अलग हो सकती है।
आपको बता दें कि भारत में आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि की दर पिछले दो दशकों में सुधरकर लगभग 53-54% [1.5] हो गई है, जबकि पहले यह औसत 35-40% के आसपास थी। इस तुलना को बेहतर समझने के लिए हम पिछले दो दशकों (2000 के दशक का शुरुआती समय और 2020 के दशक का वर्तमान समय) के प्रमुख पहलुओं को देख सकते हैं:पिछले दशक (2000-2010) की स्थितिकम दोषसिद्धि दर: इस दौरान कुल भारतीय दंड संहिता मामलों में दोषसिद्धि दर काफी कम (लगभग 35% से 40%) हुआ करती थी।पारंपरिक जांच पद्धतियाँ: पुलिस मामलों की जांच पारंपरिक तरीकों से करती थी, जिसमें वैज्ञानिक साक्ष्यों और फोरेंसिक का उपयोग सीमित था।
गवाहों का मुकरना: गवाहों को डराने-धमकाने और सुरक्षा के अभाव के कारण मुकरने के मामले बहुत अधिक होते थे, जिससे अपराधी बच निकलते थे।वर्तमान दशक (2016-2026) की स्थितिबेहतर होती दरें: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार, अब समग्र दोषसिद्धि दर बढ़कर लगभग 54% तक पहुँच गई है।तकनीक और न्याय प्रणाली: मामलों की जाँच में डिजिटल तकनीक, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और फॉरेंसिक साक्ष्यों की अनिवार्यता बढ़ाई गई है।विशेष कानून: एनआईए जैसी विशेष एजेंसियों ने आतंकवाद के मामलों में 95% तक दोषसिद्धि दर हासिल की है।
यहां यह भी बता देना चाहिए किभारत में गंभीर और सामान्य संज्ञेय अपराधों के मामलों में कुल औसत दोषसिद्धि (दोष साबित होने) की दर लगभग 50% से 54% के बीच है। अलग-अलग गंभीर अपराधों के हिसाब से यह दर अलग होती है, जैसे हत्या के मामलों में यह लगभग 42% और कुछ अन्य हिंसक अपराधों या बलात्कार के मामलों में यह लगभग 27% से 32% तक दर्ज की जाती है।विभिन्न अपराधों में स्थितिसामान्य आईपीसी मामले: लगभग 50% से 54% दोषसिद्धि दर।
हत्या के मामले: लगभग 42% दोषसिद्धि दर।बलात्कार के मामले: लगभग 28% से 32% दोषसिद्धि दर।कम दर के कारणकमजोर जांच: पुलिस जांच में पुख्ता सबूतों या फॉरेंसिक साक्ष्यों की कमी।गवाहों का मुकरना: सुनवाई के दौरान गवाहों का अपने बयानों से पलट जाना।देरी: अदालती प्रक्रियाओं और मुकदमों में लंबा समय लगना है। इतना जटिल व दुरूह प्रक्रिया का ही यह नतीजा है कि लोग अदालत से न्याय की उम्मीद ही छोड़ देते हैं। देश की विभिन्न अदालतों में कुल 5.64 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें जिला अदालतें, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय शामिल हैं।
विभिन्न स्तरों पर लंबित मामलों का विवरणउच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट): लगभग 96,000 से अधिक मामलेउच्च न्यायालय (हाई कोर्ट): लगभग 60 से 63 लाख मामलेजिला एवं अधीनस्थ अदालतें: लगभग 4.98 करोड़ मामलेमुख्य बातें और आंकड़ेनिचली अदालतों में देश के कुल लंबित मामलों का लगभग 85% से अधिक हिस्सा मौजूद है।देश में हजारों ऐसे मामले हैं जो 20 से 30 वर्षों से भी अधिक समय से लंबित हैं।हाल ही में संसद में विधि मंत्रालय द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार यह पेंडेंसी का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है।
यहां यह भी जान लीजिए कि देश में जिला और अधीनस्थ अदालतों में कुल 7,310 न्यायिक पद खाली हैं, जबकि उच्च न्यायालयों में 341 से अधिक जजों के पद रिक्त हैं।विभिन्न अदालतों में रिक्तियों का विवरणजिला और अधीनस्थ अदालतें: कुल 30,868 स्वीकृत पदों में से 23,558 अधिकारी कार्यरत हैं और 7,310 पद खाली हैं (रिक्ति दर लगभग 23.68%)।
उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट): देश के उच्च न्यायालयों में 1,122 स्वीकृत पदों में से केवल 781 जज कार्यरत हैं और 341 पद रिक्त हैं (रिक्ति दर 30% से अधिक)।मुख्य राज्यवार स्थितिउत्तर प्रदेश: जिला अदालतों में 1,000 से अधिक न्यायिक पद खाली हैं (रिक्ति दर 29.24%)।कर्नाटक: बड़े राज्यों में सबसे अधिक रिक्ति दर यहाँ है, जो 58% से ज्यादा है।
मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और हरियाणा की जिला व अधीनस्थ अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के कुल रिक्त पदों के आंकड़े इस प्रकार हैं: मध्य प्रदेश में 368, बिहार में 374, राजस्थान में 206, और हरियाणा में 217 पद खाली हैं।राज्यवार रिक्तियों का विवरणमध्य प्रदेश: अधीनस्थ अदालतों में कुल 2,051 स्वीकृत पदों में से 368 न्यायिक अधिकारियों के पद रिक्त हैं।बिहार: जिला न्यायपालिका में 2,032 स्वीकृत पदों के मुकाबले 374 पद खाली हैं।
राजस्थान: निचली अदालतों व जिला न्यायपालिका में लगभग 206 पद रिक्त बताए गए हैं।हरियाणा: अधीनस्थ न्यायपालिका में कुल रिक्त पदों की संख्या लगभग 217 है। ऐसे हालात में जब न्यायिक अधिकारियों के पद कई - कई साल से खाली पड़े है मुकदमों की संख्या बढ़ती चली चा रही है सरकार के लोक अदालत व दूसरे प्रयास अदालत का भार कम करने मे नाकाम साबित हुए हैं। कुल अपराधों की कुल संख्या के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, जहाँ जिला अदालतों में एक हजार से अधिक न्यायिक अधिकारियों के पद खाली हैं।
अपराध और न्यायिक रिक्तियों की स्थितिकुल मामले: उत्तर प्रदेश में कुल संज्ञेय अपराधों और विशेष मामलों की संख्या सबसे अधिक दर्ज की जाती है।जिला अदालतें: सरकारी आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश की अधीनस्थ अदालतों में करीब 1,000 से अधिक न्यायिक पद रिक्त हैं, जहां रिक्ति दर लगभग 29 प्रतिशत है। उच्च न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय देश के सबसे बड़े उच्च न्यायालयों में से एक है, जहां भी न्यायाधीशों के पद बड़ी संख्या में खाली हैं।
देश में पक्ष विपक्ष सभी संविधान की बात करते हैं लेकिन जब लोगों को न्याय ही नही मिलेगा अदालत के पास सुनवाई और फैसला देने का समय ही नही है तब देश संविधान के अनुसार कैसे चलेगा? अपराध की फसल को कैसे रोक सकते हैं? न्याय और व्यवस्था तभी बनेगी जब समयबद्ध न्याय की व्यवस्था होगी वरना कठोर से कठोर कानून बनाना भी महज धोखा है आम आदमी के साथ फरेब है। सरकार को इस ओर सख्त कदम उठाने चाहिए ताकि न्याय और व्यवस्था बनी रहे।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
