संपादकीय: सुरक्षा बनाम जन-व्यवस्था! लाठी नहीं; संवाद होना चाहिए रास्ता
राजधानी की सड़कों पर फिर दिखा परिचित दृश्य
- मांगों को लेकर संसद मार्च, राज्य की प्रतिक्रिया में दिखता सख्त रुख
राजधानी की सड़कों पर एक बार फिर वही परिचित दृश्य देखने को मिला, लोहे के बहुस्तरीय बैरिकेड्स, वॉटर कैनन, आंसू गैस के गोले और अपनी माँगों को लेकर आगे बढ़ते प्रदर्शनकारियों पर पुलिस का लाठीचार्ज। चाहे किसान हों, छात्र, युवा या कर्मचारी, जब भी कोई समूह अपनी मांगों को लेकर संसद मार्च का आह्वान करता है, तो राज्य की प्रतिक्रिया अक्सर इसी कठोर रुख के रूप में सामने आती है।
ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर प्रदर्शनकारियों को संसद जाने से क्यों रोका जाता है, और क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति को दबाने के लिए बल प्रयोग ही एकमात्र रास्ता है? संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।
लोकतंत्र में संसद केवल ईंट-गारे से बनी इमारत नहीं है। यह 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं और जन-प्रतिनिधित्व का सर्वोच्च केंद्र है। जब जनता को लगता है कि नीतियाँ उनके हितों के खिलाफ बनाई जा रही हैं या उनकी समस्याओं की अनदेखी हो रही है, तो जनप्रतिनिधियों और सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए संसद भवन की ओर बढ़ना एक प्रतीकात्मक और प्रभावी माध्यम बनता है।
दूसरी ओर, राज्य और पुलिस प्रशासन के पास भी संसद मार्च रोकने के अपने व्यावहारिक और सुरक्षात्मक तर्क होते हैं। संसद भवन देश का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है। वहाँ सुरक्षा में किसी भी प्रकार की चूक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। बड़े प्रदर्शनों में अक्सर असामाजिक या अराजक तत्वों के शामिल होने का अंदेशा रहता है, जिससे हिंसा भड़कने की आशंका बनी रहती है।
राजधानी के मुख्य मार्गों को बंद करने से एम्बुलेंस, दफ्तर जाने वालों और आम नागरिकों का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है। इन कारणों से प्रशासन बीएनएस (या धारा 144) के तहत निषेधाज्ञा लागू करता है और प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर या रामलीला मैदान जैसे निर्दिष्ट स्थानों तक सीमित रखने का प्रयास करता है। सुरक्षा बनाए रखना निस्संदेह प्रशासन का प्राथमिक कर्तव्य है, लेकिन सवाल बल प्रयोग के अनुपात पर उठता है। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, बुजुर्गों या महिलाओं पर अंधाधुंध लाठीचार्ज करना प्रशासनिक विफलता और असंवेदनशीलता को दर्शाता है।
लाठी और वॉटर कैनन का इस्तेमाल अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि विरोध की आवाज़ को रोकने का पहला हथियार। जब राज्य अपने ही नागरिकों पर लाठियाँ चलाता है, तो इससे लोकतंत्र की साख को गहरा धक्का पहुँचता है। सड़क और सत्ता के बीच इस टकराव की मुख्य वजह संवाद का अभाव है। यदि प्रशासन और सरकार प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से समय रहते बातचीत करें, उनके ज्ञापन स्वीकार करें और उनकी माँगों पर विचार करने का आश्वासन दें, तो संसद घेराव जैसी नौबत को टाला जा सकता है। जब औपचारिक संवाद के सारे रास्ते बंद महसूस होते हैं, तभी जनता सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होती है।
एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह विरोध को कितनी कुशलता से रोकता है, बल्कि इस बात से होती है कि वह असहमति को कितना स्थान और सम्मान देता है। सुरक्षा और जन-अधिकारों के बीच संतुलन बनाना कठिन ज़रूर है, लेकिन असंभव नहीं। सरकार को समझना होगा कि लाठियों के दम पर असंतोष को कुछ समय के लिए दबाया तो जा सकता है, लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता। बैरिकेड्स खड़े करने के बजाय संवाद के पुल बनाना ही इस समस्या का स्थायी समाधान है।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
