किसान बदल रहे खेती का तरीका, हो रहा फायदा

Published By Subhash Pandey
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सीजनल फार्मिंग: भारतीय गांवों में अब खेती का पारंपरिक ढर्रा पूरी तरह बदल रहा है और किसान भाई अब सीजनल फार्मिंग के नए ट्रेंड को अपनाकर अपनी किस्मत चमका रहे हैं. पहले जहां साल भर सिर्फ गेहूं या धान जैसी फसलों पर निर्भरता रहती थी.  वहीं अब मार्केट की डिमांड को देखते हुए किसान मौसम के हिसाब से अलग-अलग फसलें उगा रहे हैं.

इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह यह है कि अब किसान सिर्फ अन्नदाता नहीं बल्कि एक एग्री-बिजनेसमैन की तरह सोचने लगे हैं. सीजनल फार्मिंग न केवल जोखिम को कम करती है बल्कि कम समय में खेत से मोटी कमाई करने का मौका भी देती है. जान लीजिए कैसे होगी है सीजनल फार्मिंग.

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क्या होती है सीजनल फार्मिंग? 
सीजनल फार्मिंग का मतलब है मौसम के मिजाज को समझकर सही समय पर सही फसल उगाना. यह खेती का वह स्मार्ट तरीका है जिसमें किसान प्रकृति के चक्र के साथ तालमेल बिठाते हैं. जैसे सर्दियों में गेहूं और सरसों तो गर्मियों में मक्का या बाजरा लगाना. आज के दौर में इसका ट्रेंड इसलिए बढ़ रहा है.

क्योंकि यह कम लागत में ज्यादा पैदावार की गारंटी देता है. जब फसल अपने नेचुरल सीजन में उगती है तो उसे कीड़ों और बीमारियों का खतरा कम होता है जिससे कीटनाशकों का भारी खर्च बच जाता है. कुल मिलाकर यह डिमांड और सप्लाई का शानदार गेम है जो किसानों को साल भर कमाई का मौका देता है.

स्मार्ट क्रॉप रोटेशन का कमाल
सीजनल फार्मिंग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसान अब मार्केट की नब्ज पहचानने लगे हैं. सर्दियों में विदेशी सब्जियों की डिमांड हो या गर्मियों में रसीले फलों की, किसान उसी हिसाब से अपनी बुवाई की प्लानिंग करते हैं. क्रॉप रोटेशन यानी फसलों को बदल-बदल कर उगाने से जमीन की उर्वरता भी बनी रहती है और कीड़ों का हमला भी कम होता है. 

आज के दौर में किसान भाई ऑफ-सीजन सब्जियों को ग्रीन हाउस या पॉलीहाउस के जरिए उगा रहे हैं जिससे उन्हें सामान्य सीजन के मुकाबले दो से तीन गुना ज्यादा दाम मिल जाते हैं. 

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कम लागत और ज्यादा मुनाफा
सीजनल खेती की सबसे खास बात यह है कि इसमें लंबी अवधि वाली फसलों के बजाय छोटी अवधि की फसलों पर फोकस किया जाता है. मूंग, उड़द, सब्जियां या औषधीय पौधे कुछ ही महीनों में तैयार हो जाते हैं जिससे किसानों के पास साल भर कैश फ्लो बना रहता है. 

पहले जहां साल में एक या दो बार ही बड़ी रकम हाथ आती थी. अब हर तीन-चार महीने में फसल बेचकर आमदनी हो रही है. इसके साथ ही आधुनिक सिंचाई तकनीकों और कम लागत वाली खाद के इस्तेमाल ने खेती के खर्च को काफी हद तक कंट्रोल कर लिया है जिससे शुद्ध मुनाफा बढ़ रहा है.

 

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सुभाष पांडेय एक सीनियर और अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें मीडिया क्षेत्र में 32 वर्षों का समृद्ध अनुभव है। अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने समाचार लेखन, संपादन और रिपोर्टिंग के विभिन्न आयामों में कार्य करते हुए पत्रकारिता को मजबूत दिशा दी है।

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