परमार्थ निकेतन में श्रीराम कथा का 33वां दिवस, संस्कार और प्रकृति संरक्षण का संदेश

घर केवल ईंट और पत्थरों से नहीं, संस्कृति और संस्कारों से बनता है: चिदानन्द सरस्वती

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ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन के पावन गंगा तट पर आयोजित 34 दिवसीय श्रीराम कथा आज अपने 33वें दिवस में प्रवेश कर गई। भक्ति, ज्ञान, संस्कार और राष्ट्र निर्माण के संदेशों से ओतप्रोत यह दिव्य कथा अनेकों श्रद्धालुओं के हृदय में धर्म, संस्कृति और प्रकृति के प्रति जागरूकता का दीप प्रज्वलित कर रही है। कथा अब अपने समापन की ओर अग्रसर है, परंतु इसके द्वारा जागृत संकल्प और प्रेरणाएँ आने वाली पीढ़ियों के जीवन को आलोकित करती रहेंगी।

अधिक मास की पूर्णता के उपरांत स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि आज से एक नए शुभ और मंगलमय समय का प्रारम्भ हुआ है। अब सभी शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ समय आरम्भ हो चुका है। यह केवल तिथियों का परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का भी अवसर है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे आने वाले वर्षों के लिए ऐसे संकल्प लें जो स्वयं के साथ-साथ समाज, संस्कृति और राष्ट्र के लिए भी कल्याणकारी हों।

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स्वामी ने रामायण के एक प्रेरणादायी प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि राजा बाली जैसा महान पराक्रमी योद्धा, जिसने अपने बल से रावण जैसे शक्तिशाली राजा को भी अपने बाजु में दबाकर छह माह तक रखा, उसने भी अपने जीवन के अंतिम क्षणों में अपने पुत्र अंगद को भगवान श्रीराम के चरणों में समर्पित कर दिया। यह प्रसंग हमें संदेश देता है कि संसार की सबसे बड़ी शक्ति  प्रभु के चरणों में ही है।

उन्होंने कहा कि यदि हमें सनातन संस्कृति, अपने संस्कारों और अपनी गौरवशाली परंपराओं को सुरक्षित रखना है तो हमें अपनी संतानों को भगवान से जोड़ना होगा। अपने बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शिक्षा, नैतिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति का ज्ञान भी देना होगा। जब नई पीढ़ी प्रभु के चरण, शरण और आचरण को अपनाएगी, तभी संस्कृति और सभ्यता का संरक्षण संभव होगा। स्वामी  ने कहा कि श्रीराम कथा का सार यही है कि हम अपने जीवन में प्रभु के आदर्शों को धारण करें। प्रभु श्रीराम का जीवन सत्य, सेवा, त्याग, मर्यादा और करुणा का अनुपम उदाहरण है। यदि परिवार और समाज इन मूल्यों को आत्मसात कर लें तो अनेक सामाजिक समस्याएँ स्वतः समाप्त हो सकती हैं।

उन्होंने सभी परिवारों का आह्वान करते हुये कहा कि प्रतिदिन कुछ समय एक साथ बैठकर प्रार्थना करें। परिवार की सामूहिक प्रार्थना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भावनात्मक एकता, प्रेम, विश्वास और संस्कारों का आधार है। जब परिवार के सदस्य एक साथ ईश्वर का स्मरण करते हैं, तब उनके बीच के संबंध और अधिक मजबूत होता है तथा घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

स्वामी ने कहा कि घर केवल ईंट और पत्थरों से नहीं बनता, बल्कि   संस्कृति और संस्कारों से बनता है। भव्य भवन होने के बावजूद यदि उसमें प्रेम, सम्मान, करुणा, अनुशासन और आध्यात्मिकता का अभाव है तो वह केवल एक मकान है, घर नहीं। घर तब घर बनता है जब उसमें बड़े-बुजुर्गों का सम्मान, बच्चों को संस्कार, माता-पिता का स्नेह और प्रभु का स्मरण हो।

उन्होंने कहा कि यदि परिवारों में संस्कारों की कमी होगी तो समाज की नींव कमजोर हो जाएगी। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल सफल नहीं, बल्कि संस्कारी भी बनाएं। संस्कारयुक्त युवा ही राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के निर्माता बन सकते हैं।

श्रीराम कथा के दौरान लाखों-लाख पौधों के रोपण और उनके संरक्षण का संकल्प लिया गया। स्वामी ने कहा कि वृक्ष केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं करते, बल्कि जीवन की रक्षा करते हैं। एक वृक्ष अनेक पीढ़ियों को शुद्ध वायु, छाया, फल और जीवन प्रदान करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक पौधा अवश्य लगाना और उसका पालन-पोषण करना होगा।

कथा व्यास संत मुरलीधर ने कहा कि कथा अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रही है, और इसके माध्यम से लिए गए संकल्प, सनातन संस्कृति के संरक्षण, परिवारों में संस्कारों के संवर्धन, प्रभु से जुड़ाव तथा पर्यावरण संरक्षण, समाज में सकारात्मक परिवर्तन की नई चेतना का आधार है।

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लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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