जन्म से नहीं, कर्म से तय होते हैं वर्ण - ओम प्रकाश आर्य
बस्ती - आर्य समाज नई बाजार बस्ती में आयोजित वैदिक सत्संग कार्यक्रम में मनुस्मृति की दैनिक, सामाजिक और व्यावहारिक उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आर्य समाज के प्रधान ओम प्रकाश आर्य ने कहा कि समाज में व्याप्त भ्रांतियों के विपरीत मनुस्मृति जातिवाद या दलित विरोधी विचारों का समर्थन नहीं करती, बल्कि यह कर्म और योग्यता पर आधारित व्यवस्था का मार्गदर्शन करती है।सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है। विद्या और कर्म के आधार पर ही वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र बनता है।
बताया कि मनुस्मृति में जातिवाद का कोई उल्लेख नहीं है। चार वर्ण केवल योग्यता पर आधारित श्रेणियां हैं, ठीक वैसे ही जैसे आधुनिक प्रशासन में प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पद होते हैं।अयोग्य होने पर ब्राह्मण की संतान शूद्र हो सकती है और योग्यता अर्जित कर शूद्र की संतान ब्राह्मण बन सकती है। महर्षि वशिष्ठ, महर्षि व्यास और विश्वामित्र इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।उन्होंने कहा कि महर्षि मनु मानव समाज के प्रथम प्रवक्ता और आदि शासक हैं। मनुस्मृति वेदों के अनुकूल पहला धर्मशास्त्र और न्याय व्यवस्था है, जो अधिकारों के बजाय कर्तव्यों (ड्यूटी) और मानवता पर बल देती है।
आर्य ने स्पष्ट किया कि 'दलित' शब्द आधुनिक दौर की देन है, प्राचीन वैदिक संस्कृति का नहीं। मनुस्मृति केवल एक ही जाति मानती है—'मनुष्य जाति', जिसके दो भेद पुरुष और स्त्री हैं। वर्तमान समय में 'मनुवाद' शब्द का नकारात्मक उपयोग केवल अज्ञानता और निहित स्वार्थों के कारण किया जा रहा है।सामूहिक जलपान के पश्चात कार्यक्रम संपन्न हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से नितीश कुमार, परी, विश्वनाथ प्रसाद, अरविन्द कुमार, धर्मेंद्र कुमार, मनीषा निषाद, दृष्टि मोदनवाल, महिमा आर्या, राधा देवी सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।
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लेखक के बारे में
पत्रकारिता में 10 वर्षों का अनुभव रखने वाले सर्वेश श्रीवास्तव उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद में ‘तरुणमित्र’ के ब्यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं। क्षेत्रीय मुद्दों पर ज़मीनी पकड़ और तथ्यपरक कवरेज उनके काम की पहचान है।
