श्रीराम मंदिर चंदा गबन मामला: रकम बरामद, संदिग्ध भी पकड़े गए, फिर एफआईआर से परहेज क्यों?

Published By Shishir Patel
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अयोध्या। श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए जुटाए गए चंदे में कथित गबन का मामला अब नए सवालों को जन्म दे रहा है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब ट्रस्ट को गबन के साक्ष्य मिल चुके हैं, संदिग्ध व्यक्तियों की पहचान हो चुकी है और उनके पास से बड़ी रकम भी बरामद की जा चुकी है, तो आखिर अब तक पुलिस में एफआईआर क्यों दर्ज नहीं कराई गई? इस पूरे घटनाक्रम ने ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और उसकी मंशा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के अनुसार, मामला सामने आने के बाद ट्रस्ट ने शुरुआती दौर में इसे सार्वजनिक नहीं किया। जब यह प्रकरण मीडिया की सुर्खियां बना, तब भी ट्रस्ट के जिम्मेदार पदाधिकारी खुलकर सामने नहीं आए। जो लोग सामान्य दिनों में मंदिर निर्माण और अन्य गतिविधियों को लेकर लगातार बयान देते दिखाई देते थे, वे इस संवेदनशील मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। इससे लोगों के मन में संदेह और गहरा हो गया है।

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सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ट्रस्ट ने स्वयं संदिग्धों को पकड़ने और उनकी निशानदेही पर रकम बरामद करने का दावा किया है। यदि यह सही है तो यह स्पष्ट संकेत है कि चंदा राशि में अनियमितता या चोरी हुई है। ऐसे में सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत तत्काल एफआईआर दर्ज कराई जानी चाहिए थी ताकि पुलिस मामले की निष्पक्ष जांच कर सके। लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि किसी भी वित्तीय गड़बड़ी, चोरी या गबन के मामले में सबसे पहला कदम पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराना होता है। एफआईआर के बाद ही पुलिस या अन्य जांच एजेंसियां आरोपियों से पूछताछ, साक्ष्य संग्रह, बरामदगी और अन्य कानूनी कार्रवाई करती हैं। ऐसे मामलों में किसी ट्रस्ट या निजी संस्था द्वारा खुद जांच करना और संदिग्धों को पकड़ना सामान्य प्रक्रिया नहीं माना जाता।

इसी बीच मामले की जांच के लिए एसआईटी (विशेष जांच दल) का गठन कर दिया गया है। हालांकि सवाल उठ रहे हैं कि एसआईटी गठन से पहले एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई गई। विशेषज्ञों का मानना है कि एसआईटी और एफआईआर दोनों प्रक्रियाएं साथ-साथ चल सकती थीं। एफआईआर दर्ज होने से मामले को कानूनी मजबूती मिलती और जांच का दायरा भी स्पष्ट होता।

आलोचकों का कहना है कि अब हर सवाल का जवाब एसआईटी जांच के नाम पर टाल दिया जाएगा। इससे सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा, यानी एफआईआर दर्ज न कराने का सवाल, पीछे छूट सकता है। लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि कहीं किसी प्रभावशाली व्यक्ति या आंतरिक तंत्र को बचाने के लिए मामले को सीमित दायरे में रखने की कोशिश तो नहीं की जा रही।

हालांकि अभी तक ट्रस्ट की ओर से इस संबंध में कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग लगातार बढ़ रही है। चूंकि यह मामला करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और उनके योगदान से जुड़ा है, इसलिए इसकी निष्पक्ष और कानूनी जांच आवश्यक मानी जा रही है।

फिलहाल निगाहें एसआईटी की जांच पर टिकी हैं, लेकिन जब तक एफआईआर दर्ज न होने के कारणों पर स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, तब तक यह सवाल बना रहेगा कि आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है, जिसके चलते ट्रस्ट अब तक औपचारिक कानूनी कार्रवाई से बचता नजर आ रहा है।

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लेखक के बारे में

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पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।

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