शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए बनेगा रोडमैप
— अगले तीन साल में एसएनसीयू में बेडों की संख्या तीन हजार करने का लक्ष्य
— नवजात देखभाल मंथन में निकल कर आए कई अहम बिंदु
लखनऊ। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण,एनएफएचएस के आंकड़ों से उत्साहित होकर स्वास्थ्य विभाग ने नवजात मृत्यु दर और कम करने के लिए तीन साल का रोडमैप बनाने का फैसला किया है। इसके तहत प्रदेश में मौजूद 120 स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट में बेडों की संख्या तीन हजार पहुंचाने का लक्ष्य मुख्य बिंदु होगा। इस समय इन एसएनसीयू में 1892 बेड हैं। अपर मुख्य सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अमित कुमार घोष ने संबंधित अधिकारियों को यह निर्देश गुरुवार को स्टेट इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर में आयोजित मंथन के दौरान दिया। उन्होंने कहा कि बेशक एनएफएचएस और एसआरएस के आंकड़ों में नवजात मृत्यु दर में कमी आई है लेकिन जन्म के तुरंत बाद होने वाली मृत्यु के आंकड़ों में बदलाव न होना चिंताजनक है। इसके लिए हमें एक रोडमैप बनाकर काम करना होगा और उन कारकों को तलाश कर उनपर फोकस होकर काम करना होगा। यूनिसेफ,सेंटर फार एडवोकेसी एंड रिसर्च और उत्तर प्रदेश टेक्निकल सपोर्ट यूनिट के सहयोग से आयोजित इस मंथन में यह बात सामने आई कि एक घंटे,एक दिन व सात दिन के अंदर सबसे ज्यादा शिशुओं की मौतें होती हैं। विशेषज्ञों ने माना कि प्रसव कक्ष में जहां प्रसूता डाक्टर व नर्स की निगरानी में रहती है उसी तरह शिशु की निगरानी के लिए एक बाल रोग विशेषज्ञ व एक नर्स होना चाहिए। जन्म लेने के बाद भी डाक्टर व नर्स को लगातार बच्चे पर नजर रखनी होगी। इतना भर करने से नवजात मृत्युदर में काफी कमी आ जाएगी। डॉ.हिमांशु भूषण ने कहा कि गोल्डन आवर के दौरान होने वाली मृत्यु को कम करने के लिए बाल रोग विशेषज्ञों को प्रसव कक्ष में जिम्मेदारी निभानी होगी। दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज की निदेशक डॉ सुषमा नागिया ने कहा कि जो स्त्री रोग विशेषज्ञ किसी महिला का प्रसव करा रही है वह नवजात के देखभाल की विशेषज्ञता नहीं रखती है। इसलिए मेरे-तेरे की भावना से आगे आकर बाल रोग विशेषज्ञ व एक नर्स को शिशु की देखभाल करनी होगी।

देहरादून के हिमालय इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस के प्राचार्य डॉ अशोक देवरारी ने शिशुओं के गुणवत्तापरक इलाज पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा करके हम 80 से 90 प्रतिशत बच्चों का इलाज कर सकते हैं। उन्हें उच्च मेडिकल संस्थानों में रेफर करने की जरूरत नहीं है। सीपैप मशीन के जनक कहे जाने वाले वरिष्ठ नियोनेटोलाजिस्ट डॉ श्रीनिवास मुर्की ने सीपैप मशीन के विस्तार पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समस्त प्रसव कक्षों में सीपैप मशीन लगानी चाहिए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के महाप्रबंधक डॉ मिलिंद वर्धन ने बताया कि प्रदेश में 30 प्रतिशत प्रसव ऐसे स्वास्थ्य केंद्रों पर हो रहे हैं जहां पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। विभाग ने इन स्वास्थ्य केंद्रों के 6000 स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित किया है। किंग जार्ज मेडिकल विश्वविद्यालय,केजीएमयू के बालरोग विभागाध्यक्ष डॉ एसएन सिंह ने कहा कि हर प्रसव को इमरजेंसी की तरह लेना चाहिए चाहे वह प्रिटर्म हो या सामान्य। केजीएमयू की स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डॉ अंजू अग्रवाल ने स्टाफ नर्स की कमी का मुद्दा उठाया। उन्होंने भी प्रसव कक्ष में कम से कम दो नर्स होने की बात पर जोर दिया।
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लेखक के बारे में
शुभम कश्यप को पत्रकारिता और मीडिया क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है और वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं। उनकी विशेषज्ञता चिकित्सा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी खबरों और अस्पताल आधारित रिपोर्टिंग में है, जहाँ वह विषयों को तथ्यपरक, सटीक और जिम्मेदार ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
