महाभारत काल के जीवन्त प्रमाण है महादेवा कुन्तेश्वर धाम महादेव मंदिर
सावन मास के प्रथम सोमवार पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु करेंगे जलाभिषेक
मनोज शर्मा
बाराबंकी। सरयू उच्छल जलधि तरंग तोया बाराह बन के नाम से विख्यात जनपद बाराबंकी का पौराणिक दृश्य अपना अलग ही महत्व है जहां पर देवाधि देव भगवान शिव की नगरी महादेवा कुंतेश्वर धाम पारिजात धाम समेत कई तीर्थ स्थल व पर्यटक स्थल विद्यमान है महाशिवरात्रि व पुरुषोत्तम मास सावन मास के प्रत्येक सोमवार पर देश के कोने-कोने से लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान भूत भावन शिव की नगरी महादेवा में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करके मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं।
जिला मुख्यालय के करीब 40 किलोमीटर दूर उत्तर सरयू नदी के तट पर भगवान शिव की नगरी महादेवा स्थित है जहां पर देश के कोने-कोने से लाखों की संख्या में कांवरिए व श्रद्धालु नाचते गाते मयूर पंखियों से सजी कांवरे लेकर त्रिनेत्र धारी भगवान शिव का जलाभिषेक व रुद्राभिषेक करके मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं लोगों में यह धारणा है कि जिस प्रकार माता वैष्णवी के दर्शन करने के बाद भक्तगण भैरवनाथ के दर्शन अवश्य करते हैं उसी प्रकार से महादेवा में जलाभिषेक करने के बाद कांवरिए ग्राम किंतूर स्थित माता कुंती द्वारा स्थापित अद्भुत शिवलिंग का जलाभिषेक करने के पश्चात देव बृक्ष पारिजात के दर्शन अवश्य करते हैं।
ये खबर भी पढ़े : देवरिया : सीएचसी के महिला शौचालय में भ्रूण मिलने के मामले में जांच तेज, सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही पुलिसकुन्तेश्वर धाम की पौराणिकता के संबंध में कहा जाता है कि द्वापर युग के महाभारत काल में पांडवों ने अज्ञातवास के समय अपना कुछ समय सरयू नदी के तट पर व्यतीत किया था उस समय पांडवों की माता कुंती ने अपने पुत्रों से शिवार्चन करने की इच्छा प्रकट किया तो माता की आज्ञा पाकर महाबली भीम पर्वत मालाओं में विचरण करते हुए एक शिवलिंग को बह़गी में रखकर चल दिए जब उन्हें चलने में असुविधा हुई तो उसी के आकार का दूसरा शिवलिंग उन्होंने बहंगी के दूसरी ओर रख लिए जिसमें से एक शिवलिंग को माता कुंती ने अपने हाथों से सरयू नदी के तट पर प्रत्यारोपित कर दिया और उस स्थान का नाम कुंतेश्वर धाम रख दिया कालांतर में धीरे-धीरे वहां पर आबादी बसने लगी और एक गांव कुंतीपुर के नाम से बस गया बाद में अपभ्रंश सोकर किंतूर के नाम से विख्यात हुआ।
कुंतेश्वर महादेव मंदिर में माता कुंती आज भी करती हैं प्रथम शिवार्चन
इस स्थान की पौराणिकता के संबंध में कहा जाता है कि आज भी माता कुंती यहां पर रात्रि 12:00 बजे के आसपास जलाभिषेक करने आती हैं सूरज डूबने के पश्चात रात्रि में मंदिर के इस अद्भुत शिवलिंग पर चढ़ाई गई सामग्री को हटा दिया जाता है रात्रि 12:00 बजे के आसपास कोई अदृश्य शक्ति यहां पर आकर के जलाभिषेक कर जाती है जो अपने आप में रहस्य बना हुआ है यहां पर जलाभिषेक करने से लोगों की सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती है ऐसा लोगों का विश्वास है।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
