अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड कॉल सेंटर का लखनऊ में भंडाफोड़, 119 आरोपी गिरफ्तार

अमेरिका के नागरिकों को बनाया जाता था निशाना

Published By Shishir Patel
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लखनऊ। कमिश्नरेट लखनऊ पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित एक बड़े साइबर फ्रॉड नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई में 119 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह गिरोह राजधानी के विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग के 11वें तल पर फर्जी अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटर संचालित कर रहा था। यहां से इंटरनेट आधारित कॉलिंग सिस्टम और आधुनिक तकनीक का उपयोग कर मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के नागरिकों को ठगी का शिकार बनाया जाता था।

पुलिस ने मौके से 103 लैपटॉप, 68 कॉलिंग के लिए प्रयुक्त एप्पल आईफोन, 109 व्यक्तिगत मोबाइल फोन, 99 कंप्यूटर माउस, 116 हेडफोन, 111 लैपटॉप चार्जर, 8 वाई-फाई/इंटरनेट राउटर, एक बायोमेट्रिक मशीन, इंटरनेट आधारित कॉलिंग सिस्टम, बड़ी मात्रा में डिजिटल डेटा, फर्जी दस्तावेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य बरामद किए हैं।

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2 jul61

यह कार्रवाई साइबर अपराधियों के विरुद्ध चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत पुलिस आयुक्त अमरेंद्र कुमार सेंगर के निर्देशन, संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध एवं मुख्यालय) अपर्णा कुमार के पर्यवेक्षण, पुलिस उपायुक्त अपराध अनिल कुमार यादव के मार्गदर्शन तथा अपर पुलिस उपायुक्त (अपराध) किरण यादव (IPS) के नेतृत्व में साइबर क्राइम सेल और थाना साइबर क्राइम की संयुक्त टीम ने 1 जुलाई 2026 को की। कार्रवाई के दौरान पूरे कॉल सेंटर को सील कर सभी कर्मचारियों एवं प्रबंधन से जुड़े लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई, जिसके बाद 119 लोगों को विधिक प्रक्रिया के तहत गिरफ्तार किया गया।

दर्ज हुआ मुकदमा

इस मामले में थाना साइबर क्राइम, कमिश्नरेट लखनऊ में मु0अ0सं0 78/2026 के तहत भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 3(5), 61(2), 318(4), 319(2), 336(3), 337, 338, 340(2) तथा आईटी एक्ट की धारा 66C, 66D एवं टेलीकॉम एक्ट-2023 की धारा 42 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया है।

ऐसे देते थे साइबर ठगी को अंजाम

प्रारंभिक जांच में सामने आया कि यह गिरोह अत्यंत संगठित और तकनीकी रूप से प्रशिक्षित था। आरोपी VoIP Calling System, Eyebeam Dialer (भारत में प्रतिबंधित) और अन्य इंटरनेट आधारित कॉलिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग कर अमेरिका के नागरिकों से संपर्क करते थे।

पहले चरण में आरोपी स्वयं को Amazon, Microsoft, Apple, PayPal, Netflix और Facebook जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों का अधिकृत प्रतिनिधि या कस्टमर सपोर्ट अधिकारी बताते थे। पीड़ितों से कहा जाता था कि उनके बैंक खाते, डिजिटल वॉलेट या पहचान (Identity) से जुड़ी गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है अथवा उनके नाम पर अपराध हो रहा है।

जब पीड़ित घबरा जाता था तो कॉल दूसरे स्तर पर स्थानांतरित कर दी जाती थी। वहां आरोपी स्वयं को Federal Trade Commission (FTC), Federal Bureau of Investigation (FBI), US Marshal Service, United States Treasury Department और United States District Court का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी, बैंक खाते सीज होने और कानूनी कार्रवाई का भय दिखाते थे।

विश्वास दिलाने के लिए आरोपियों द्वारा ई-मेल के माध्यम से Court Order, Identity Theft Report, FTC Letter, Investigation Report और Non-Disclosure Agreement (NDA) जैसे सरकारी दस्तावेजों की हूबहू नकल तैयार कर भेजी जाती थी।

चार चरणों में चलती थी ठगी

जांच में पता चला कि पूरा कॉल सेंटर किसी कॉर्पोरेट कंपनी की तरह संचालित होता था और प्रत्येक कर्मचारी की जिम्मेदारी अलग-अलग तय थी।

पहला चरण 

विदेशी नागरिकों को फर्जी टेक्स्ट संदेश भेजे जाते थे। संदेश में दावा किया जाता था कि उनके Amazon, Apple या Samsung अकाउंट का उपयोग बाल यौन शोषण सामग्री, मादक पदार्थ तस्करी या आतंकी गतिविधियों में हुआ है। साथ ही एक टोल-फ्री नंबर देकर अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए कॉल करने को कहा जाता था।

दूसरा चरण 

पीड़ित के कॉल करने पर डायलर टीम बातचीत शुरू करती थी और उसे विश्वास दिलाती थी कि उसके नाम पर कई बैंक खाते आपराधिक गतिविधियों में इस्तेमाल हुए हैं।

तीसरा चरण 

इसके बाद कॉल बैंकर टीम को ट्रांसफर होती थी। यहां पीड़ित से उसके बैंक खाते, उपलब्ध धनराशि, कार्ड और अन्य वित्तीय जानकारी ली जाती थी। उसे बताया जाता था कि जांच पूरी होने तक उसके बैंक खाते और Social Security Number (SSN) फ्रीज हो जाएंगे। इसलिए धनराशि को सुरक्षित रखने के लिए उसे Gift Card, Cryptocurrency अथवा नकदी में बदलना आवश्यक है।

चौथा चरण

अंतिम चरण में कॉल क्लोजर टीम को भेजी जाती थी। टीम के सदस्य स्वयं को FTC या अन्य अमेरिकी सरकारी एजेंसियों का वरिष्ठ अधिकारी बताकर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते थे और पीड़ित से अमेज़न, वॉलमार्ट, सेफोरा आदि के गिफ्ट कार्ड नंबर और पिन प्राप्त कर लेते थे। कई मामलों में क्यूआर कोड के माध्यम से क्रिप्टोकरेंसी ट्रांसफर कराई जाती थी, जबकि कुछ मामलों में अमेरिका में दिए गए पते पर नकदी या सोना भिजवाया जाता था अथवा पिकअप कराया जाता था।

भर्ती का तरीका भी था सुनियोजित

विवेचना में सामने आया कि गिरोह विभिन्न राज्यों से ऐसे युवाओं की भर्ती करता था जिन्हें BPO अथवा International Calling Process का अनुभव था। कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था Solaris Solutions नामक कंपनी के माध्यम से कराई जाती थी, जबकि किसी भी कर्मचारी को नियुक्ति पत्र, अनुबंध अथवा अन्य वैधानिक दस्तावेज नहीं दिए जाते थे।

अवैध कमाई का नेटवर्क

गिरोह सीधे बैंक खातों में पैसा लेने के बजाय Gift Card, Digital Voucher और Cryptocurrency के माध्यम से भुगतान प्राप्त करता था, ताकि धन के स्रोत और अंतिम लाभार्थी तक पहुंचना कठिन हो सके। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि इस अवैध धनराशि को विभिन्न डिजिटल माध्यमों से आगे ट्रांसफर किया जाता था।

बरामद हुए महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य

पुलिस को बरामद इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की प्रारंभिक जांच में Eyebeam Dialer, इंटरनेट आधारित कॉलिंग सॉफ्टवेयर, कॉलिंग स्क्रिप्ट, विदेशी नागरिकों का डेटा, ई-मेल टेम्पलेट, फर्जी सरकारी दस्तावेज, नकली कोर्ट ऑर्डर, Identity Theft Report, FTC Letter, Non-Disclosure Agreement (NDA) समेत साइबर अपराध से जुड़ी बड़ी मात्रा में डिजिटल सामग्री मिली है।

इन डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर अब पूरे नेटवर्क, सर्वर, ई-मेल अकाउंट, तकनीकी सहयोगियों, वित्तीय लेन-देन और अंतरराष्ट्रीय कड़ियों की विस्तृत जांच की जा रही है।

मुख्य आरोपी

पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों में ऑपरेशन मैनेजर ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार समेत कुल 119 आरोपी शामिल हैं। प्रारंभिक जांच में सभी की भूमिका कॉल सेंटर संचालन, विदेशी नागरिकों से संपर्क, फर्जी दस्तावेजों के उपयोग और साइबर ठगी में पाई गई है। गिरफ्तार आरोपी गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, झारखंड, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश सहित कई राज्यों के निवासी हैं, जिससे गिरोह के अखिल भारतीय नेटवर्क का संकेत मिलता है।

पुलिस की आगे की कार्रवाई

कमिश्नरेट लखनऊ पुलिस ने कहा है कि बरामद इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का विशेषज्ञों द्वारा फॉरेंसिक विश्लेषण कराया जा रहा है। विवेचना के दौरान सामने आने वाले प्रत्येक तथ्य के आधार पर इस नेटवर्क से जुड़े अन्य व्यक्तियों, वित्तीय लाभार्थियों, तकनीकी सहयोगियों तथा संभावित अंतरराज्यीय एवं अंतरराष्ट्रीय कड़ियों की पहचान कर उनके विरुद्ध भी कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

पुलिस ने स्पष्ट किया कि कमिश्नरेट लखनऊ साइबर अपराधों के विरुद्ध Zero Tolerance Policy के तहत पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहा है और भविष्य में भी ऐसे संगठित साइबर अपराधों के खिलाफ तकनीकी दक्षता, प्रभावी खुफिया सूचना और विधिक प्रावधानों के माध्यम से निर्णायक कार्रवाई जारी रहेगी।

साइबर सुरक्षा के लिए पुलिस की अपील

लखनऊ पुलिस आयुक्त अमरेंद्र कुमार सेंगर ने नागरिकों से अपील की है कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं को किसी कंपनी या सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर बैंक खाते, सोशल सिक्योरिटी नंबर, ओटीपी, गिफ्ट कार्ड, क्रिप्टोकरेंसी या किसी अन्य माध्यम से धनराशि जमा कराने के लिए कहे तो उस पर विश्वास न करें। किसी भी संदिग्ध कॉल, संदेश या साइबर धोखाधड़ी की तत्काल सूचना साइबर हेल्पलाइन या निकटतम पुलिस थाने को दें।

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लेखक के बारे में

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पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।

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