पालिका के आमों पर ‘खास’ लोगों की नजर! लाखों की फसल की बंदरबांट को लेकर अफजलगढ़ में चर्चा तेज
रामनाथ सिंह
अफजलगढ़। नगर पालिका परिषद अफजलगढ़ की बहुमूल्य सरकारी संपत्ति रहे आम के बाग को न्यायालयी प्रक्रिया के बाद कब्जामुक्त कराए जाने के पश्चात अब उसकी आम की फसल को लेकर नगर में नई चर्चा शुरू हो गई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि लाखों रुपये मूल्य की आम की फसल का वितरण बिना किसी सार्वजनिक सूचना, टेंडर प्रक्रिया अथवा पारदर्शी व्यवस्था के कुछ चर्चित व्यक्तियों के बीच कर दिया गया।
नगर में चर्चा है कि वर्षों तक न्यायालय में विचाराधीन रहने के बाद जब पालिका को बाग का कब्जा प्राप्त हुआ तो लोगों को उम्मीद थी कि उसकी उपज का लाभ नगर पालिका को मिलेगा और नियमानुसार नीलामी अथवा टेंडर के माध्यम से राजस्व अर्जित किया जाएगा। लेकिन आरोप है कि ऐसा नहीं हुआ और फसल के प्रबंधन में पारदर्शिता नहीं बरती गई, जिससे सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।
ये खबर भी पढ़े : डीएम ने बाढ़ सुरक्षा कार्यों का लिया जायजा, मानसून से पहले तैयारियां पूरी करने के निर्देशस्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि आम की फसल की खुली नीलामी कराई जाती तो पालिका को लाखों रुपये की आय हो सकती थी। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि कुछ प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए पूरी प्रक्रिया को सीमित दायरे में रखा गया।
नगर पालिका परिषद की कार्यप्रणाली को लेकर इससे पहले भी सवाल उठते रहे हैं। गौशाला में टीन पट्टों की खरीद, इंटरलॉकिंग कार्यों तथा अन्य विकास योजनाओं को लेकर सभासदों द्वारा आवाज उठाई जा चुकी है। हालांकि चर्चित मामलों में अब तक किसी ठोस कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसे में आम के बाग की फसल का मामला भी नगर में चर्चा और विवाद का विषय बन गया है।
नगर के सामाजिक एवं राजनीतिक लोगों ने मांग की है कि आम की फसल के प्रबंधन, वितरण और उससे प्राप्त आय का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि यदि कोई नीलामी या निविदा प्रक्रिया अपनाई गई थी तो उसके अभिलेख सार्वजनिक किए जाएं।
सरकारी संपत्ति और उससे होने वाली आय को लेकर उठे इस विवाद ने नगर पालिका प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब लोगों की नजर इस बात पर टिकी है कि पालिका अध्यक्ष और अधिशासी अधिकारी इस मामले में क्या स्पष्टीकरण देते हैं और क्या किसी प्रकार की जांच कराई जाती है।
सार्वजनिक निकायों की संपत्तियों के उपयोग और उनसे होने वाली आय के लिए पारदर्शी प्रक्रिया अपनाना सुशासन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। विभिन्न नगर निकायों में सरकारी भूमि और संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
