विश्वास की नई वर्दी: डीजीपी राजीव कुमार शर्मा के नेतृत्व में बदली राजस्थान पुलिस की तस्वीर

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प्रकाश चन्द्र शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

राजस्थान पुलिस के महानिदेशक राजीव कुमार शर्मा 3 जुलाई को अपने नेतृत्व का पहला वर्ष पूरा करने जा रहे हैं। बीते बारह महीनों में राजस्थान पुलिस ने केवल कानून-व्यवस्था संभालने तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखा बल्कि आधुनिक तकनीक, पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता को अपनी कार्यशैली का अभिन्न हिस्सा बनाकर पुलिसिंग को नई दिशा देने का प्रयास किया। यह वर्ष इस बात का प्रमाण बना कि यदि नेतृत्व स्पष्ट सोच और दृढ़ संकल्प वाला हो तो व्यवस्था की धड़कन भी बदल सकती है। 

सामान्य मानवीय व्यवहार में सहज, सरल और एकदम सौम्य लेकिन इससे ठीक उलट राजकीय सेवा में कड़क मिजाज, आत्मविश्वास से लवरेज, दृढसंकल्पित, कर्तव्य के प्रति अति निष्ठ और कितनी भी विपरीत परिस्थितियों में त्वरित निर्णय की अपूर्व क्षमता के चलते डीजीपी राजीव कुमार शर्मा ने साबित कर दिया कि किसी भी कार्य के परिणाम कुर्सी से स्वत:स्फूर्त नहीं होते बल्कि उस पर आसीन व्यक्ति के मन और मष्तिष्क में छिपी कुछ नया करने की असीम क्षमताओं को वास्तविकता के धरातल पर उतारने से निकलते हैं। 

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राजस्थान जैसे विशाल भौगोलिक विस्तार और विविध सामाजिक परिस्थितियों वाले राज्य में अपराध नियंत्रण किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता। साइबर अपराधों का बढ़ता जाल, महिला सुरक्षा की चुनौती, संगठित अपराधों पर अंकुश और बदलते अपराध स्वरूपों के बीच पुलिस ने नई रणनीतियों के साथ कार्य किया। डीजीपी राजीव कुमार शर्मा ने पुलिसिंग को केवल अपराधियों पर शिकंजा कसने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जनविश्वास अर्जित करने के अभियान में परिवर्तित करने का प्रयास किया। मानो उन्होंने यह संदेश दिया कि पुलिस की असली ताकत केवल वर्दी नहीं, बल्कि जनता का विश्वास भी है।

इस अवधि में तकनीक राजस्थान पुलिस की सबसे बड़ी सहयोगी बनकर उभरी। डिजिटल मॉनिटरिंग, डेटा आधारित अपराध विश्लेषण, ऑनलाइन शिकायत निस्तारण, आधुनिक अनुसंधान प्रणाली तथा साइबर अपराधों की रोकथाम के लिए तकनीकी संसाधनों का व्यापक उपयोग किया गया। बदलते समय के साथ कदमताल करते हुए पुलिस ने यह साबित किया कि अब अपराध से लड़ाई केवल मैदान में नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी उतनी ही मजबूती से लड़ी जा रही है। समय के साथ चलने वाला ही समय को बदलता है—यह कहावत इस पहल पर सटीक बैठती है।
महिला सुरक्षा, बाल संरक्षण तथा कमजोर वर्गों के मामलों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना भी इस कार्यकाल की उल्लेखनीय उपलब्धियों में शामिल रहा। अधिकारियों को पीड़ितों के प्रति संवेदनशील व्यवहार अपनाने के स्पष्ट निर्देश दिए गए, जिससे पुलिस की छवि कठोर व्यवस्था के साथ-साथ सहानुभूतिपूर्ण सहयोगी संस्था के रूप में भी मजबूत हुई। यही संवेदनशीलता किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक पहचान मानी जाती है।

साइबर अपराधों के बढ़ते खतरे को देखते हुए जागरूकता अभियान चलाए गए, विशेषज्ञ टीमों को सक्रिय किया गया तथा तकनीकी जांच क्षमता को मजबूत बनाया गया। ऑनलाइन ठगी और डिजिटल अपराधों के विरुद्ध व्यापक रणनीति अपनाकर पुलिस ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि अपराधी चाहे जितना शातिर हो, कानून का हाथ उससे लंबा ही रहता है।

डीजीपी शर्मा के नेतृत्व की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में पुलिसकर्मियों के कल्याण को प्राथमिकता देना भी रहा। तनाव प्रबंधन, मानसिक स्वास्थ्य, बेहतर कार्य वातावरण, पारिवारिक समस्याओं के समाधान और कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान दिया गया। मैदानी स्तर पर कार्यरत जवानों और अधिकारियों के मनोबल को बढ़ाने, उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित करने तथा उनकी समस्याओं के त्वरित समाधान की संस्कृति विकसित करने का प्रयास पुलिस महकमे में नई ऊर्जा का संचार करता दिखाई दिया। आखिर, मजबूत प्रहरी वही बन सकता है जिसका मनोबल भी मजबूत हो।

जहाँ उत्कृष्ट कार्य करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों का उत्साहवर्धन किया गया, वहीं लापरवाही और अनुशासनहीनता पर भी कठोर रुख अपनाया गया। पुरस्कार और अनुशासन के बीच संतुलन बनाकर कार्यसंस्कृति को अधिक उत्तरदायी और परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास किए गए। लोहे को लोहा ही काटता है—यह कहावत प्रशासनिक अनुशासन पर पूरी तरह चरितार्थ होती दिखाई दी।

पुलिस और जनता के बीच संवाद को मजबूत बनाने के लिए जनसुनवाई, सोशल मीडिया के प्रभावी उपयोग तथा सामुदायिक पुलिसिंग को भी नई गति मिली। इससे आम नागरिकों की सहभागिता बढ़ी और पुलिस के प्रति विश्वास की डोर पहले से अधिक मजबूत होती दिखाई दी। लोकतंत्र में यही संवाद व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी माना जाता है।
संगठित अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध हथियारों के नेटवर्क, हिस्ट्रीशीटरों की निगरानी तथा वांछित अपराधियों की धरपकड़ के लिए राज्यभर में विशेष अभियान चलाए गए। जिला स्तर से लेकर पुलिस मुख्यालय तक सतत मॉनिटरिंग की व्यवस्था ने कानून-व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई का यह सिलसिला यह संदेश देता रहा कि कानून की पकड़ से बच निकलना आसान नहीं।

भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए युवा पुलिसिंग की अवधारणा को भी बढ़ावा दिया गया। प्रशिक्षण, तकनीकी दक्षता और आधुनिक अनुसंधान पद्धतियों पर विशेष बल देकर युवा अधिकारियों और कर्मचारियों को नवाचार अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया, ताकि राजस्थान पुलिस बदलते समय की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को निरंतर विकसित करती रहे।

डीजीपी राजीव कुमार शर्मा के प्रथम वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यही मानी जा सकती है कि उन्होंने पुलिसिंग को केवल अपराध नियंत्रण की परंपरागत परिभाषा से आगे बढ़ाकर जनविश्वास, पारदर्शिता, संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीक के समन्वय से जोड़ने का प्रयास किया। यदि यही गति और दृष्टि आगे भी बनी रही, तो राजस्थान पुलिस न केवल अपराध नियंत्रण में बल्कि जनोन्मुखी और उत्तरदायी पुलिसिंग के राष्ट्रीय मॉडल के रूप में भी अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकती है। बीते एक वर्ष ने इस दिशा में मजबूत नींव रखी है और आने वाले समय से अपेक्षाएँ भी उसी अनुपात में बढ़ गई हैं।

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‘तरुणमित्र’ श्रम ही आधार, सिर्फ खबरों से सरोकार। के तर्ज पर प्रकाशित होने वाला ऐसा समचाार पत्र है जो वर्ष 1978 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जैसे सुविधाविहीन शहर से स्व0 समूह सम्पादक कैलाशनाथ के श्रम के बदौलत प्रकाशित होकर आज पांच प्रदेश (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तराखण्ड) तक अपनी पहुंच बना चुका है। 

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