एआई की निगरानी से बदल जाएगी भारतीय राजमार्गों की पूरी तस्वीर

थ्रीडी लेजर, एआई और डेटा तकनीक से हाईवे होंगे ज्यादा सुरक्षित

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रमेश चंद्र

  • 300 किलोमीटर प्रतिदिन तक होगा हाईटेक सड़क सर्वेक्षण
  • अब गड्ढों और दरारों पर तुरंत तय होगी जवाबदेही 

नई दिल्ली। देश में लगातार बढ़ते राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क के बीच अब उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तकनीक को सबसे बड़ा हथियार बनाया जा रहा है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजमार्गों की निगरानी व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए अत्याधुनिक नेटवर्क सर्वे व्हीकल (एनएसवी) प्रणाली लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, थ्रीडी लेजर स्कैनिंग, हाई-रिजोल्यूशन कैमरों और जीपीएस आधारित यह व्यवस्था सड़कों की निगरानी के पारंपरिक तरीके को पूरी तरह बदल सकती है। अब तक राष्ट्रीय राजमार्गों का निरीक्षण मुख्य रूप से मैनुअल सर्वे या सीमित तकनीकी संसाधनों के सहारे किया जाता था। इससे सड़क की वास्तविक स्थिति का आकलन करने में लंबा समय लगता था और कई बार छोटी खराबियां गंभीर रूप लेने के बाद ही मरम्मत तक पहुंच पाती थीं। नई प्रणाली इस चुनौती को काफी हद तक समाप्त करने का दावा करती है।

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हाईटेक नेटवर्क सर्वे व्हीकल सड़क पर सामान्य गति से चलते हुए हर गड्ढे, दरार, पैचवर्क की गुणवत्ता, सतह की असमानता और अन्य तकनीकी खामियों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करेंगे। यह पूरा डेटा सीधे एआई आधारित डेटा लेक प्लेटफॉर्म पर अपलोड होगा, जहां विशेषज्ञ उसका विश्लेषण कर मरम्मत की प्राथमिकता तय करेंगे। इससे सड़क रखरखाव केवल शिकायत आधारित नहीं बल्कि डेटा आधारित व्यवस्था में बदल जाएगा। नई तकनीक का सबसे बड़ा लाभ सर्वेक्षण की गति में दिखाई देगा।

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पहले जहां एक दिन में केवल 20 से 80 किलोमीटर तक सड़क का निरीक्षण संभव था, वहीं अब लगभग 300 किलोमीटर प्रतिदिन का डिजिटल सर्वे किया जा सकेगा। इससे पूरे राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क की नियमित निगरानी पहले की तुलना में कई गुना तेज हो जाएगी।इस व्यवस्था की दूसरी बड़ी विशेषता समयबद्ध कार्रवाई है। सर्वे के बाद 48 घंटे के भीतर पूरा डेटा केंद्रीय सर्वर पर उपलब्ध होगा और विशेषज्ञ टीम दस दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी। पहले यही प्रक्रिया पूरी होने में चार से छह महीने तक लग जाते थे। समय की यह बचत सड़क सुरक्षा और रखरखाव दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। सरकार ने केवल सर्वेक्षण तक ही इस पहल को सीमित नहीं रखा है।

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साइट इंजीनियरों और निरीक्षकों को मोबाइल एप भी उपलब्ध कराया जाएगा, जिसके माध्यम से वे वास्तविक समय में रिपोर्ट देख सकेंगे, जियो-टैग्ड तस्वीरें अपलोड करेंगे और मरम्मत कार्य की प्रगति दर्ज करेंगे। इससे निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही तीनों मजबूत होंगी।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इस तकनीक का प्रभावी और नियमित उपयोग हुआ तो राष्ट्रीय राजमार्गों पर दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों में शामिल सड़क संबंधी खामियों को समय रहते दूर किया जा सकेगा। साथ ही रखरखाव की गुणवत्ता पर भी लगातार नजर बनी रहेगी। डिजिटल निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और समयबद्ध कार्रवाई का यह मॉडल भारतीय सड़क अवसंरचना प्रबंधन को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिसका सीधा लाभ करोड़ों यात्रियों को सुरक्षित, सुगम और भरोसेमंद सफर के रूप में मिल सकता है।

लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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