व्यंग्य रचना " बेईमानों की इमानदारी "
साधो, इस संसार में ईमानदारों की कोई कमी नहीं है। बस उन्हें पहचानने की दृष्टि चाहिए। लोग व्यर्थ कहते हैं कि ईमानदारी खत्म हो गई। सच तो यह है कि वह पहले से कहीं अधिक व्यवस्थित, प्रशिक्षित और प्रोफेशनल हो चुकी है। फर्क बस इतना है कि उसने अपना पता बदल लिया है। अब वह मंदिरों, दफ्तरों और उपदेशों में नहीं, सीधे बेईमानों की गोद में बैठती है।
बेईमान आदमी अपने धंधे के प्रति अद्भुत निष्ठावान होता है। जो करेगा, खुलकर करेगा। उसे अपने चरित्र को लेकर कोई भ्रम नहीं होता। वह जानता है कि वह क्या है, क्यों है और किस दर पर उपलब्ध है। ऊपर वाले का भी पूरा ध्यान रखता है,एक परमात्मा और दूसरे वे, जो फाइलों के ऊपर बैठे हैं। चढ़ावे समय पर चढ़ते हैं, हिस्से नियम से पहुँचते हैं और साझेदारी इतनी पारदर्शी होती है कि किसी बेईमान को आज तक यह शिकायत लेकर थाने जाते नहीं सुना गया,“साहब, मेरे साथी ने मेरे हिस्से की बेईमानी में भी बेईमानी कर दी।”
रिश्वत भी पूरे सम्मान से लेते हैं। आपके चाय-नाश्ते की कद्र करते हैं, क्योंकि वह आपकी जेब से निकला होता है। फाइल दबानी हो तो तय प्रक्रिया से दबाते हैं, निकालनी हो तो निर्धारित दर पर निकालते हैं। उनके हाथी के दाँत दिखाने और चबाने के अलग-अलग नहीं होते। जो हैं, सो सामने हैं।
अब ज़रा स्वयंभू ईमानदारों पर भी दृष्टि डालिए। चेहरे पर अकड़, व्यवहार में उपदेश और हर तीसरे वाक्य में घोषणा,“मैंने आज तक एक पैसा नहीं खाया।” अनुभव बताता है कि ऐसे लोगों में से कई या तो कामचोर निकलते हैं या अवसर-वंचित बेईमान। जिन्हें बड़ा मौका नहीं मिला, वे छोटी बेईमानी को अपने स्तर से नीचे समझते हैं। उनकी आत्मा फुटकर में नहीं बिकती; वह थोक मंडी खुलने की प्रतीक्षा करती है।
हाँ, दफ्तरों में आपका भी कभी न कभी उन अकड़ू ईमानदारों से पाला पड़ा होगा। मैं तो कहता हूँ, वे बिल्ली के उस अवशिष्ट की तरह हैं-न लीपने के, न पोतने के। जनता की कमर तोड़ देंगे, लेकिन फाइल नहीं चलने देंगे। कहते हैं-"काम नियम से होगा।" और उनके यहाँ नियम का सीधा-सा अर्थ होता है-काम नहीं होगा। रिश्वत नहीं लेते, यह उनका गुण है; लेकिन काम भी नहीं करते, यह उनकी मौलिकता है। ऐसे ईमानदारों से तो वह बेईमान लाख गुना अच्छा, जो कम-से-कम काम तो कर देता है।
बेईमान इस मामले में भी ज्यादा लोकतांत्रिक है। वह छोटी-बड़ी बेईमानी में भेदभाव नहीं करता। अवसर मिले तो उसका अपमान नहीं करता। सुबह से शाम तक जुटा रहता है। जनता को घुमाता है, फाइल को नचाता है, नियमों को मोड़ता है, लेकिन काम को काम समझता है, बोझ नहीं। उसकी ऊर्जा, उसकी तत्परता और उसका नेटवर्क देखकर कई कॉर्पोरेट विभाग भी शरमा जाएँ।
राजनीति ने तो ईमानदारी को और भी आधुनिक अर्थ दे दिया है। यहाँ नेता पूरी ईमानदारी से पार्टी बदलता है, पूरी ईमानदारी से बयान बदलता है, पूरी ईमानदारी से जनता को भूलता है और चुनाव आते ही पूरी ईमानदारी से उसे याद कर लेता है। कल तक जिसे राष्ट्र-विरोधी बता रहा था, आज उसी को राष्ट्र-निर्माण का अनिवार्य स्तंभ घोषित कर देता है। यह वैचारिक लचीलापन नहीं, नई किस्म की ईमानदारी है,अवसरवादिता के प्रति ईमानदारी।
आजकल ईमानदारी निभाई कम, दिखाई ज्यादा जाती है। टोपी, बैनर, पोस्टर, प्रेस-कॉन्फ्रेंस, रील और इंटरव्यू,हर जगह ईमानदारी सजधज कर बैठी मिल जाएगी। कोई ऑटोवाला खाली पर्स लौटा दे, तो अगले दिन अखबारों में खबर बन जाती है। बाद में पता चलता है कि पर्स में आधार कार्ड, दो एटीएम रसीदें और तीन ईएमआई की पर्चियाँ थीं। फिर भी उसने लौटाया,यह ऐतिहासिक घटना है। इतने कठिन समय में आदमी खाली पर्स भी लौटा दे, तो समाज उसे नैतिकता का स्तंभ मानने लगता है।
साधो, मैंने भी बहुत दिन ईमानदारी खोजी। मंदिर गया, दफ्तर गया, मंचों पर गया, घोषणापत्र पढ़े, भाषण सुने। अंत में एक अनुभवी ज्ञानी ने कान में कहा,“गलत जगह तलाश रहे हो। ईमानदारी बेईमानों के भीतर खोजो।” बात सीधी लगी। उनकी बेईमानी में लक्ष्य स्पष्ट है, प्रक्रिया तय है, दरें निश्चित हैं और हिस्सेदारी पारदर्शी।
असली संकट उन ईमानदारों से है, जो अपनी अकड़ में व्यवस्था रोक देते हैं। बेईमान कम-से-कम व्यवस्था को चलाते तो हैं। इसीलिए लगता है कि इस युग की सबसे प्रामाणिक ईमानदारी वही है, जो बेईमान अपनी बेईमानी के प्रति निभाते हैं।
रचनाकार –डॉ मुकेश असीमित
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