कंजूस कैसे बनें? गुप्ता जी से सीखिए बचत का महाग्रंथ: डॉ सुरेश कुमार मिश्रा 

शहर में जब किसी को 'बचत' पर कोई रिसर्च करनी होती, तो वो सीधे गुप्ता जी से संपर्क

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पड़ोस के गुप्ता जी जब मुस्कुराते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे उनके चेहरे का हर मसल अपनी मेहनत की दिहाड़ी मांग रहा हो। वैसे तो गुप्ता जी इंसान भले हैं, पर अपनी जेब के मामले में वे मुग़ल सल्तनत के उन बादशाहों जैसे हैं जो एक-एक अठन्नी का हिसाब रखने के लिए पूरे वज़ीर की फ़ौज खड़ी कर दें। शहर में जब भी किसी को 'बचत' पर कोई रिसर्च करनी होती, तो वो सीधे गुप्ता जी की बैठक में आकर टहलने लगता। उनके घर में जब नया टूथपेस्ट आता है, तो पुराने वाले के साथ वो-वो यातनाएं होती हैं जिन्हें देखकर किसी का भी कलेजा कांप जाए। 

बेलन से पछाड़ने के बाद उसे बीच से काटा जाता है, फिर उसकी हर दीवार को ऐसे खुरचा जाता है जैसे किसी पुरातत्व विभाग वाले को हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा खजाना मिल गया हो। जब वो टूथपेस्ट एकदम रूह की तरह हवा हो जाता है, तब कहीं जाकर नए वाले का सील टूटने की नौबत आती है। और ये तो बस शुरुआत है, क्योंकि गुप्ता जी की नज़र में दुनिया का सबसे बड़ा अपराध है - किसी भी चीज़ का मुफ़्त में न मिलना या किसी चीज़ का इस्तेमाल किए बिना फेंक दिया जाना।

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गर्मियों के दिनों में जब पूरा मोहल्ला पंखे और कूलर की हवा के लिए बिल के पन्ने पलट-पलटकर रोता है, गुप्ता जी की गणित अलग ही तल पर चल रही होती है। उनके घर में मेहमान आ जाए, तो चाय बनने से पहले गुप्ता जी खिड़की का पर्दा थोड़ा खिसकाकर सूरज की दिशा देखते हैं। अगर धूप ढल रही हो, तो मेहमान को इतनी सहजता से बालकनी में ले जाकर बिठाते हैं कि मेहमान को लगता है कि उसे दुनिया का सबसे हसीन नज़ारा दिखाया जा रहा है, जबकि असल में गुप्ता जी पंखे की बिजली का आधा यूनिट बचा रहे होते हैं। रसोई में अगर चाय उबल जाए, तो बची हुई पत्ती को दोबारा सुखाकर 'शाम की चाय' के लिए सहेज लेना उनके लिए किसी महान उपलब्धि से कम नहीं होता। जब वो बाज़ार जाते हैं, तो सब्जी वाले से धनिया और हरी मिर्च मांगने का उनका अंदाज़ इतना कातिलाना होता है कि सब्जी वाला अपनी जेब से दो रुपये निकालकर देने को तैयार हो जाए, पर गुप्ता जी बिना मिर्च-धनिया लिए एक कदम पीछे नहीं हटते।

शादी-ब्याह के माहौल में गुप्ता जी का अवतार देखने लायक होता है। उनका जो लिफ़ाफ़ा शादी के स्टेज पर दूल्हे के हाथ में जाता है, उस लिफ़ाफ़े की अपनी एक अलग कहानी होती है। वो लिफ़ाफ़ा कम से कम चार अलग-अलग शादियों से घूमता हुआ गुप्ता जी तक पहुँचा होता है, जिसे उन्होंने बड़ी नज़ाकत से बिना फाड़े संभालकर रखा था। अंदर रखे नोट का कुरकुरापन देखकर लगता है जैसे वो नोट नोटपैड से नहीं, सीधे बैंक के लॉकर से ख़ास इसी शुभ अवसर के लिए निकाला गया हो। प्लेट में खाना लेते वक्त गुप्ता जी का संयम किसी समाधिलीन साधु से कम नहीं दिखता, पर नज़र हर उस स्टॉल पर होती है जहाँ मुफ़्त का मीठा या पाचक बंट रहा हो। तीन बार आइसक्रीम खाने के बाद भी जब वो वेटर से चौथी बार 'जरा एक चम्मच और देना' कहते हैं, तो उनके चेहरे पर एक ऐसी मासूमियत होती है जिसे देखकर वेटर भी अपनी पूरी नौकरी दांव पर लगाने को तैयार हो जाता है।

गाड़ी चलाने के मामले में गुप्ता जी का दर्शन तो सीधे नोबेल पुरस्कार का हकदार है। उनकी पुरानी बजाज चेतक जब सड़क पर निकलती है, तो ढलान आते ही उसका इंजन बंद हो जाता है। गुप्ता जी न्यूट्रल में गाड़ी चलाकर पेट्रोल बचाने का जो आनंद लेते हैं, वो किसी रेसिंग कार ड्राइवर को भी नसीब नहीं होता। रास्ते में रेड लाइट अगर बीस सेकंड की भी हो, तो गुप्ता जी तुरंत चाबी घुमाकर इंजन को विश्राम दे देते हैं। उनके हिसाब से बीस सेकंड में जितना पेट्रोल जलता है, उतने में तो एक पूरे परिवार का एक दिन का खर्चा चल सकता है। गाड़ी के टायर जब तक एकदम चिकने होकर आईने की तरह चमकने न लगें, तब तक नया टायर खरीदने का विचार उनके दिमाग के आसपास भी नहीं भटकता। वो अक्सर कहते हैं कि टायर का असली ग्रिप तो तब आता है जब वो सड़क को अपनी आत्मा से छूने लगे।

मोबाइल और तकनीक के इस दौर में गुप्ता जी ने कंजूसी को एक नया डिजिटल आयाम दे दिया है। उनके घर का वाई-फाई कभी चालू नहीं मिलता, पर पड़ोसी का वाई-फाई किस कोने में सबसे तेज़ आता है, यह नक्शा उनके दिमाग में पूरी तरह छपा होता है। जब भी किसी को फोन करना हो, तो वो एक मिस कॉल मारते हैं और फिर स्क्रीन को ऐसे घूरते हैं जैसे सामने वाला खुद चलकर उनके पास आ जाएगा। अगर गलती से कॉल उठ जाए, तो पहले दस सेकंड में पूरी बात - 'हाँ, ठीक हूँ, तुम बताओ, फिर बात करते हैं' - निपटाकर फोन काट देते हैं। व्हाट्सएप पर आए लंबे-लंबे वीडियो वो कभी मोबाइल डेटा से नहीं देखते, बल्कि संडे को जब किसी रिश्तेदार के घर जाते हैं, तो चाय की चुस्की के साथ डाउनलोड की लाइन लगा देते हैं। उनका फोन कवर इतना पुराना और घिसा हुआ होता है कि फोन भी अंदर बैठकर अपनी किस्मत पर रोता होगा।

आख़िरकार, गुप्ता की यह जीवनशैली सिर्फ पैसा बचाने का जरिया नहीं है, यह उनके लिए एक साधना है, एक कला है जिसमें वो रोज नए मुकाम हासिल करते हैं। कपड़े धोने के बाद बचे हुए पानी से पोछा लगाना और फिर उसी पानी को गमले में डालकर 'कुदरत का संतुलन' बनाए रखना उनके दिनचर्या का हिस्सा है।

दीवाली पर जले हुए दीयों का तेल बटोरकर अगले दिन का दीपक जलाना या साबुन का छोटा सा टुकड़ा जब गलने लगे तो उसे नए साबुन पर चिपकाकर उसकी ज़िंदगी दो हफ्ते और बढ़ा देना - यह सब कोई साधारण इंसान नहीं कर सकता। इसके लिए जिगर चाहिए और एक ऐसा दिल चाहिए जो पैसों की खनक से नहीं, बल्कि बचाए गए पैसों के अहसास से धड़कता हो। 

गुप्ता को देखकर बस यही ख्याल आता है कि दुनिया भले ही चांद पर पहुँच जाए, पर जो सुख एक फटे हुए बनियान को पोंछा बनाकर आखिरी सांस तक इस्तेमाल करने में है, वो सुख किसी नई फरारी कार में भी नहीं मिल सकता।

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लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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