हाईकोर्ट ने कहा आपराधिक अदालत किसी दस्तावेज को फर्जी घोषित कर इस आधार पर सजा नहीं सुना सकती
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वर्ष 1986 के एक बहुचर्चित अपहरण और जालसाजी के मामले में सत्र न्यायालय, एटा द्वारा आरोपियों को दी गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द करते हुए राम किशोर, राम भरोसे, भूदेव और दिनेश सिंह को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।
उत्तर प्रदेश के एटा जनपद के जैथरा थाने में दर्ज मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता फूलश्री ने आरोप लगाया था कि उसके भाई राम दुलारे को 8 मार्च 1986 को आरोपी बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गए थे। उन्होंने किसी अन्य व्यक्ति को राम दुलारे के स्थान पर खड़ा कर उसकी जमीन का फर्जी बैनामा दिनेश के नाम करा लिया और बाद में राम दुलारे को गायब कर दिया। इस मामले में आईपीसी की धारा 364, 420, 468 और 471 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था।
सत्र न्यायालय, एटा ने 9 अक्टूबर 1990 को सभी चारों आरोपियों को दोषी करार देते हुए धारा 364 में आजीवन कारावास, धारा 420 में पांच वर्ष और धारा 468 में सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के तीनों प्रत्यक्षदर्शी गवाहों कृपाल सिंह, फूलश्री और महावीर के बयानों का बारीकी से विश्लेषण करते हुए पाया कि इनके बयानों में परस्पर विरोधाभास हैं और "अंतिम बार साथ देखे जाने" के सिद्धांत को समर्थन देने वाला कोई ठोस पुष्ट साक्ष्य मौजूद नहीं है। कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उसकी पुष्टि करने वाला अन्य सुसंगत साक्ष्य न हो।
न्यायालय ने कहा कि "लास्ट सीन टुगेदर" सिद्धांत स्वयं में अपराध सिद्ध करने का पर्याप्त आधार नहीं है। इसके अलावा, पीठ ने ट्रायल कोर्ट की इस टिप्पणी को भी गलत ठहराया कि विवादित बिक्री-पत्र फर्जी था, क्योंकि यह निर्णय किसी सक्षम सिविल न्यायालय द्वारा साक्ष्यों की जांच के बाद नहीं दिया गया था।
हाईकोर्ट के अनुसार, कोई भी आपराधिक अदालत बिना सिविल कोर्ट के निर्णायक निष्कर्ष के किसी दस्तावेज़ को फर्जी घोषित कर धोखाधड़ी और जालसाजी का दोषी नहीं ठहरा सकती। रिपोर्ट दर्ज कराने में हुई करीब एक महीने की देरी को भी अदालत ने संदेहास्पद माना, जिसका अभियोजन पक्ष कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका। इन तमाम कमियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को साक्ष्यों के विपरीत और विधि के स्थापित सिद्धांतों के प्रतिकूल मानते हुए रद्द कर दिया और सभी चारों अपीलकर्ताओं को दोषमुक्त करार दिया। चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर थे, अदालत ने उन्हें आत्मसमर्पण से छूट देते हुए उनकी जमानत बॉन्ड रद्द कर दी।
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