पॉवर कॉरपोरेशन पर भ्रामक सूचना भेजने का आरोप, संघर्ष समिति ने जताई नाराज़गी
तीन वर्षों से एक बार भी वार्ता नहीं हुई, फिर भी समाधान का झूठा दावा करते: संघर्ष समिति
लखनऊ। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने ऊर्जा निगमों के शीर्ष प्रबंधन पर बिजली कर्मचारियों एवं अत्यल्प मानदेय पर कार्यरत संविदा कर्मियों की समस्याओं के संबंध में शासन को भ्रामक एवं तथ्यहीन जानकारी भेजकर गुमराह करने का गंभीर आरोप लगाया है। संघर्ष समिति ने कहा कि यह प्रवृत्ति न केवल कर्मचारियों के हितों के विरुद्ध है, बल्कि शासन के समक्ष वास्तविक स्थिति को छिपाने का प्रयास भी है।
संघर्ष समिति के केंद्रीय पदाधिकारियों ने बताया कि संघर्ष समिति द्वारा कर्मचारियों एवं संविदा कर्मियों की समस्याओं के संबंध में भेजे गए पत्रों पर जब शासन अथवा माननीय ऊर्जा मंत्री कार्यालय द्वारा आख्या मांगी जाती है, तब पॉवर कॉरपोरेशन प्रबंधन वास्तविक समाधान करने के बजाय भ्रामक उत्तर भेजकर प्रकरण को समाप्त करने का प्रयास करता है।
संघर्ष समिति ने बताया कि इसका ताज़ा उदाहरण ऊर्जा निगमों के संविदा कर्मियों को माननीय मुख्यमंत्री द्वारा घोषित प्रस्तावित आउटसोर्स निगम में शामिल किए जाने का है। इस संबंध में संघर्ष समिति द्वारा प्रबंधन को पत्र भेजा गया था। शासन को भेजी गई आख्या में प्रबंधन ने कहा है कि "सिस्टम में सुधार एवं तकनीकी पुनर्गठन (वर्टिकल व्यवस्था) के कारण आवश्यकता के अनुसार ही संविदा कर्मियों को रखा जा रहा है तथा यह व्यवस्था तकनीकी दृष्टि से आवश्यक है।"
संघर्ष समिति ने इस दावे को वास्तविकता से परे बताते हुए कहा कि यदि वास्तव में व्यवस्था में इतना सुधार हो चुका है कि संविदा कर्मियों की आवश्यकता कम हो गई है, तो फिर बिजली वितरण के निजीकरण का औचित्य क्या है? यदि व्यवस्था सक्षम और सुदृढ़ है तो निजीकरण की आवश्यकता क्यों बताई जा रही है? दूसरी ओर उपभोक्ताओं की संख्या और विद्युत भार लगातार बढ़ रहा है, नियमित भर्ती वर्षों से बंद है और इसके विपरीत संविदा कर्मियों की लगातार छंटनी की जा रही है। यह स्थिति स्वयं प्रबंधन के दावों का खंडन करती है।
संघर्ष समिति ने प्रबंधन द्वारा शासन को भेजे गए उस दावे को भी पूरी तरह असत्य बताया जिसमें कहा गया है कि कर्मचारियों के संगठनों की मांगों पर समय-समय पर वार्ता कर समाधान किया जाता रहा है। संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया कि पिछले लगभग तीन वर्षों में पॉवर कॉरपोरेशन प्रबंधन ने विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उप्र के साथ एक बार भी वार्ता नहीं की है। ऐसे में शासन को वार्ता एवं समाधान का दावा भेजना पूरी तरह भ्रामक और तथ्यविहीन है।
संघर्ष समिति ने तथाकथित "वर्टिकल व्यवस्था" पर भी गंभीर प्रश्न उठाते हुए कहा कि यदि यह व्यवस्था तकनीकी दृष्टि से इतनी ही आवश्यक और प्रभावी है, तो प्रबंधन यह स्पष्ट करे कि देश के किस राज्य में यह मॉडल सफलतापूर्वक लागू है। वास्तविकता यह है कि यह व्यवस्था निजी क्षेत्र की कार्यप्रणाली से प्रेरित है, जिसका उद्देश्य न्यूनतम कर्मचारियों से अधिकतम कार्य लेना है। जबकि गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, आंध्र प्रदेश सहित अनेक राज्यों में बिजली क्षेत्र में उत्तर प्रदेश की तुलना में कहीं अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं और वहां बिजली व्यवस्था अधिक सुदृढ़ है।
संघर्ष समिति ने कहा कि पॉवर कॉरपोरेशन प्रबंधन को अपनी हठधर्मिता छोड़कर शासन को गुमराह करने के बजाय कर्मचारियों के प्रतिनिधियों से सकारात्मक वार्ता करनी चाहिए। सभी लंबित समझौतों, विशेष रूप से 19 मार्च 2023 के समझौते का तत्काल पालन किया जाए तथा कर्मचारियों एवं संविदा कर्मियों के विरुद्ध चल रही समस्त उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियां वापस ली जाएं। कर्मचारियों के सहयोग और विश्वास के बिना बिजली व्यवस्था को सुदृढ़ नहीं बनाया जा सकता।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
