मिशन-2027- अहम किरदार बना दलित-मुस्लिम वोट बैंक
कांग्रेस में इस वर्ग को साधने की मुहिम तेज
लखनऊ। यूपी विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है लेकिन कांग्रेस ने अपनी सियासी शतरंज बिछानी शुरू कर दी है। पार्टी एक बार फिर अपने पुराने और कारगर दलित-मुस्लिम समीकरण को धार देने की तैयारी में है। कांग्रेस के इस दांव से सपा में बेचैनी दिख रही है। पार्टी आलाकमान की इस रणनीति से यूपी में सपा-कांग्रेस गठबंधन पर भी संशय के बादल मड़रा रहे हैं।
मालूम हो कि कांग्रेस का एक समय दलित वोट बैंक लगभग 23 प्रतिशत हुआ करता था। लेकिन राम मंदिर आंदोलन के बाद यह वोट बैंक बसपा की तरफ खिसक गया और अब बड़ी संख्या में बीजेपी के साथ खड़ा नजर आ रहा है। केंद्र और राज्य सरकार की लाभकारी योजनाओं को इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है। कांग्रेस आलाकमान को भी दलित वोट की अहमियत अब समझ आने लगी है। इस मुहिम को धार देने के लिए प्रदेश कांग्रेस प्रभारी की कमान दलित नेता राजेन्द्र पाल गौतम को सौंपी है।
यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार में वे कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं। पेशे से वकील राजेंद्र पाल गौतम अपनी मजबूत अंबेडकरवादी और सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए जाने जाते हैं। बसपा प्रमुख मायावती की मिलने की कोशिश को लेकर वह खासी चर्चा में आए थे। राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का प्रभारी बनाए जाने के बाद राजनीतिक महकमे में चर्चा तेज हो गई है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में मुस्लिम लगभग 3 करोड़ 84 लाख 83 हजार यानी 19.26 प्रतिशत थे। यदि इसी हिंसाब से आंकलन किया जाये तो मुस्लिम आबादी बढ़कर लगभग 24 प्रतिशत तक पहुंच गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा मुस्लिम बाहुल्य वाले जिले मुरादाबाद 50.82 प्रतिशत, रामपुर: 50.57 प्रतिशत, बिजनौर: 43.04 प्रतिशत, सहारनपुर 41.95 प्रतिशत, मुजफ्फरनगर: 41.30 प्रतिशत व लखनऊ: 21.46 प्रतिशत हैं। दलित आबादी की बात करें तो 2011 जनगणना में एससी-एसटी का अलग प्रतिशत आधिकारिक रूप से जारी नहीं हुआ, लेकिन अनुमान और पुराने सर्वे के आधार पर 1999-2000 हुकुम सिंह पैनल रिपोर्ट ने ग्रामीण यूपी में दलित 25 प्रतिशत, ओबीसी 37.50 प्रतिशत का आंकलन किया गया था। कुल मिलाकर यह कहें कि अब यूपी में लगभग 40 प्रतिशत दलित, ओबीसी और मुस्लिम मतदाता हो गये हैं। इतनी बड़ी आबादी किसी भी राजनीतिक दल को सत्ता तक पहुंचाने के लिए काफी है। भाजपा नई-नई योजनाओं से दलित-मुस्लिम वोटर को अपनी ओर लाने के लिए कवायद में जुटी है तो सपा भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है। कांग्रेस भी अब इस मुहिम में कूद गई है। प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी दलित चेहरे राजेन्द्र पाल को सौंपने के बाद अब प्रदेश अध्यक्ष के लिए मुस्लिम चेहरे की तलाश शुरू हो गई है।
यह भी चर्चा है कि पश्चिमी यूपी से किसी मुस्लिम चेहरे पर दांव लगाया जाए। क्योंकि पश्चिम यूपी मुस्लिम बाहुल्य है। पश्चिमी यूपी में मुस्लिमों की आबादी 20 से 40 प्रतिशत तक है। इसीलिए अधिकांश मुस्लिम सांसद एवं विधायक इसी क्षेत्र से चुन कर आते हैं। सहारनपुर में जाट, मुस्लिम, र्गुजर, दलित एवं पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व है। प्रदेश में निर्वाचित 34 मुस्लिम विधायकों में 21 इसी क्षेत्र के हैं। इसी तरह यूपी में 5 मुस्लिम सांसदों में चार वेस्ट यूपी के ही है। इस तरह आबादी के अनुरूप में मुस्लिमों का सियासी प्रतिनिधित्व बेहद कम है। इसलिए मुस्लिमों पर दांव लगाने की संभावना प्रबल है। कांग्रेस की रणनीति यदि अमलीजामा पहनती है तो सपा इसे कतई स्वीकार नहीं करेगी। क्योंकि सपा मुस्लिम वोटर को अपना वोट बैंक मानती है। यूपी में कांग्रेस का सपा के साथ एलायंस है।
2027 में भी यह गठबंधन बरकरार रहेगा या नहीं इस पर संसय बना हुआ है। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष शरद मिश्र ने बताया कि सपा के साथ गठबंधन बरकरार है लेकिन सम्मानजनक एवं बराबरी का समझौता होगा। दलित मुस्लिम हमारा पुराना वोट बैंक रहा है। पार्टी ने इस वर्ग के लिए खुब कार्य भी किया है। इसलिए दलितों को बीजेपी से और मुस्लिमों को सपा से वापस लाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस प्रदेश की सभी सीटों पर अपना संगठन मजबूत कर इस वर्ग को जोड़ने का कार्य कर रही है।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
राजेश कुमार सिंह को पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 26 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बीएससी, एलएलबी और मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। वर्तमान में वह हिंदी दैनिक ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं। राजनीतिक, प्रशासनिक और शासन से जुड़े विषयों पर उनकी गहरी समझ है।
