चीन की मलक्का दुविधा और ग्रेट निकोबार परियोजना
चीन का समकालीन राजनीतिक नेतृत्व कम्युनिस्ट क्रांति(1949ई) की उपज है। माओत्से तुंग के विस्तारवाद से प्रेरित इस देश ने अपना शताब्दी (2049ई) लक्ष्य -'चीन राष्ट्र का महान पुनरुत्थान' घोषित किया है। यह लक्ष्य मूलत: चीन को एकमात्र आर्थिक- सैनिक विश्वशक्ति बनाने का राष्ट्रीय संकल्प है।चीनी सेना के कर्नल लियू मिंगफू की पुस्तक 'द चाइना ड्रीम' जो चीन में बेस्ट सेलर है। इसमें लियू ने महाशक्ति बनने की रणनीतियों के चर्चा क्रम में लिखा है कि चीन को सुपर पावर अमेरिका से सोवियत संघ की तर्ज पर किसी शीत युद्ध में नहीं पड़ना चाहिए। बल्कि अपनी प्रसरणशील आर्थिक-सैनिक ताकत के बूते अमेरिका की विदेश नीति को द्वितीय विश्वयुद्ध की स्थिति में पहुंचा देना चाहिए।जब ग्रेट ब्रिटेन बिना किसी प्रतिरोध के वर्ल्ड ऑर्डर में अपना शीर्ष स्थान अमेरिका को सौंपने के लिए विवश हो गया था। इजरायल- अमेरिका और ईरान के युद्ध ने यह संदेश दे दिया है कि भविष्य की विश्वशक्ति का निर्धारण नौसैनिक ताकत एवं समुद्री भू-रणनीति से होगा।विश्व नेतृत्व की महत्वाकांक्षा में चीन ने पिछले दो दशकों में ही समुद्री जहाज निर्माण क्षमता में अमेरिका को पीछे धकेल दिया है। 395 जलपोतों की नौसेना वाला चीन संख्या की दृष्टि से अमेरिका से बड़ी नौसेना है।
विश्व नेतृत्व के राष्ट्रीय स्वप्न को चीन तेजी से मूर्त रूप दे रहा है।आज पीपीपी (क्रय शक्ति समता) के मामले में चीन की जीडीपी 44 ट्रिलियन डॉलर पहुंच कर अमेरिकी से आगे है। वैश्विक उत्पादन में चीन का 30% हिस्सा है,जबकि अमेरिकी हिस्सेदारी महज 17% है।वैश्विक निर्यात में चीन 3.51 ट्रिलियन डॉलर के साथ शीर्ष पर है। विश्व व्यापार में भी चीन की 12% हिस्सेदारी है।120 देशों के शीर्ष व्यापारिक साझेदार चीन के चालू खाते का अधिशेष वर्ष 2025 में 243 बिलियन डॉलर था, वहीं अमेरिकी चालू खाता अधिशेष की जगह 190 बिलियन डॉलर के व्यापार घाटे का है।2000 ई. में चीन की जीडीपी 1.2 ट्रिलियन थी,जो 2026 में लगभग बीस गुना बढ़ 20.85 ट्रिलियन डॉलर हो गयी।लेकिन इस तीव्र आर्थिक विकास के भौतिक आधार ने ऊर्जा खपत में अनुपातिक वृद्धि को जन्म दिया है।
वर्ष 2000ई.में चीन में तेल की खपत 3.25 मिलियन बैरल प्रतिदिन से चार गुना बढ़कर वर्ष 2025 में 15 मिलियन बैरल प्रतिदिन हो गई है।आज चीन विश्व का सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक एवं उपभोक्ता है।वैश्विक ऊर्जा खपत का 25%, तेल का 15%, एलएनजी (समुद्री गैस) के 16%हिस्से का उपभोग अकेले चीन करता है।उसके ऊर्जा प्रवाह का मलक्का जलडमरू मध्य ही समुद्री रणनीतिक मार्ग है।मलक्का स्ट्रेट से चीन के कुल व्यापार का एक तिहाई एवं उसके तेल आयात का 83% हिस्सा गुजरता है जो उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी है। मलक्का स्ट्रेट अपने सबसे सकरे बिंदु पर 2.5 किलोमीटर चौड़ा एवं 30 मीटर गहरा है। युद्ध जैसे हालात में मलक्का स्ट्रेट की नाकेबंदी के खतरे को महसूस करते हुए चीन के पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ ने इसे 'मलक्का-दुविधा' की संज्ञा दी।वैकल्पिक मार्ग की तलाश में चीन ने बीआरआई (बेल्ट रोड इनीशिएटिव) परियोजना के तहत 150कमजोर देशों में बंदरगाहों, महामार्गों, रेल नेटवर्क के विकास के नाम पर कुल 1.3 ट्रिलियन का कर्ज देकर इन्हें ऋणजाल में फंसा दिया है। ऋणग्रस्त देशों के द्वीपों एवं बंदरगाहों पर नौसैनिक अड्डों के विकास के साथ ही इनकी मुख्य भूमि से चीन की सरहद तक कॉरिडोर का निर्माण किया जा रहा है, जैसे 'चीन- पाकिस्तान इकोनामिक कॉरिडोर' (सीपेक) एवं 'चीन - म्यांमार इकोनामिक कॉरिडोर' (सीमेक) आदि।
ग्रेट निकोबार की परियोजना की घोषणा वर्ष 2021में नीति आयोग ने की थी, जिसे एनजीटी ने 11 नवंबर 2022 को स्वीकृति दी।80000 करोड रुपए की यह परियोजना ग्रेट निकोबार द्वीप के 160वर्ग किमी क्षेत्रफल पर निर्माणाधीन है।इस परियोजना में गलाथिया खाड़ी में 16 मिलियन टीईयू क्षमता वाला अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीन फील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, छः लाख की आबादी वाली एक टाउनशिप तथा एक पावर प्लांट आदि का विकास किया जाना है। हमारे देश का लगभग 75% ट्रांसशिपमेंट के लिए कार्गो कोलंबो, दुबई और सिंगापुर पर निर्भर है, जिससे देश को18000 करोड़ रूपया प्रतिवर्ष अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है।मोदी सरकार ने केरल में भारत के प्रथम ट्रांसशिपमेंट पोर्ट-विझिंजम के विकास में सफलता हासिल की है।भारतीय समुद्री तटों पर छिछली गहराई ट्रांसशिपमेंट पोर्ट के विकास की मुख्य बाधा है। ग्रेट निकोबार की गलाथिया खाड़ी में तट रेखा के पास औसत गहराई 20 -30 मीटर है,जो सिंगापुर की तट रेखा की औसत गहराई 18-22 मीटर से भी बेहतर है।
सामरिक स्तर पर वर्ष 2001 से ट्राई सर्विस कमांडअर्थात तीनों सेनाओं का एकीकृत नियंत्रण केंद्र अंडमान निकोबार में से संचालित है। लेकिन इस प्रोजेक्ट से तीनों सेनाओं की शक्ति में अभूतपूर्व विस्तार होगा।इस परियोजना में गलाथिया खाड़ी में प्रस्तावित ट्रांसशिपमेंटपोर्ट के पास एक डिफेंस एंक्लेव बनेगा,जहां लड़ाकू जलपोतों की डॉकिंग की उच्च स्तरीय सुविधाएं उपलब्ध होगी।यहां के ग्रीन फील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट में नागरिक एवं सैनिक दोहरे उपयोग की सुविधा होगी। यहां हमारे उन्नत लड़ाकू विमान, जलपोतों एवं बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ ही बहुचर्चित सुपर सोनिक क्रूज मिसाइल 'ब्रह्मोस' के तैनाती की बुनियादी संरचना का विकास होगा।ऑपरेशन सिंदूर के समय पाकिस्तान में तैनात चीन निर्मित एयर डिफेंस सिस्टम ( एच क्यू-9) अवाक्स (एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम) को ब्रह्मोस ने भेदते हुए पाकिस्तान में सफल हमला किया। हिंद महासागर में स्ट्रिंग आफ पर्ल रणनीति से भारत को घेरने के लिए चीन ने जिबूती, पाकिस्तान में ग्वादर, श्रीलंका में हंबनटोटा, म्यांमार में कोको बंदरगाह पर चीनी सैन्य अड्डों की स्थापना की है। ग्रेट निकोबार परियोजना हिंद महासागर में सैन्य संतुलन चीन के बरक्स भारत के पक्ष में स्थापित करेगी।हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी की इंडोनेशिया यात्रा में मलक्का के प्रवेश द्वार पर सबांग बंदरगाह के विकास के लिए भारत के साथ संपन्न ऐतिहासिक समझौता से मलक्का स्ट्रेट पर निगरानी- नियंत्रण में भारत को रणनीतिक मजबूती मिलेगी।
पर्यावरणविद् एवं विपक्षी दल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी आदि के अनुसार इस परियोजना में दस लाख से अधिक हरे वृक्षों की कटाई, लेदरबैक कछुओं के प्रवासी आवास के विनाश, शोम्पेन एवं निकोबारी जनजातीय समुदाय के विस्थापन तथा समृद्ध जैव मंडल की क्षति होगी। सरकार ने स्पष्टीकरण दिया है कि हरियाणा में प्रतिपूरक वृक्षारोपण, वनीकरण होगा।वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए आठ गलियारों की योजना है, जिससे मगरमच्छ, कछुए सांप एवं वृक्षों पर रहने वाले जीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित होगी। शोम्पेन एवं निकोबारी जनजाति समुदाय को संरक्षित किया जाएगा। पर्यावरण एक ग्लोबल समस्या है। विश्व की सर्वाधिक आबादी होते हुए भी भारत में प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत एवं भारत की सकल राष्ट्रीय ऊर्जा खपत चीन के बरक्स बहुत मामूली है। भारत की सनातन संस्कृति वृक्षों,वन्यजीवों, प्राणी मात्र के प्रति करुणा एवं उनके संरक्षण का संस्कार देती है। हमारा लोकतांत्रिक नेतृत्व भी पर्यावरण के प्रति संवेदनशील है। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट सिंगापुर की तर्ज पर एक आधुनिक शहर का विकास करेगा। इससे चीन की दुविधा (मलक्का स्ट्रेट) पर भारत का प्रभावी नियंत्रण क्षमता एवं निगरानी स्थापित होगी। निश्चित रूप से यह परियोजना इक्कीसवीं सदी के भारत की राष्ट्रीय आवश्यकता है।
लेखक
जय प्रकाश पांडेय
(अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार)
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