बदायूं: तरही मुशायरे में शायरों ने बांधा समां, दिल साफ़ नहीं आपका तो कैसी इबादत...
बदायूं। चराग़-ए-सुख़न और बज़्म-ए-अब्र के बैनर तले सरसैयद पैरामेडिकल कॉलेज में तरही मुशायरे का आयोजन किया गया। स्थानीय व बाहरी शायरों ने बेहतरीन कलाम पेश कर समां बांध दिया। मुख्य अतिथि डॉ. मुनव्वर ताबिश संभली रहे। अध्यक्षता डॉ. सोहराब ककरालवी, संचालन अजमत जीलानी ने किया।
अमरोहा से आए आसी हसनपुरी ने नात से आग़ाज़ किया। उन्होंने ग़ज़ल सुनाई- देते थे कभी जान गुलिस्तां के लिए हम, अब ज़िक्र गुलिस्तां का भी अच्छा नहीं लगता। सादिक अलापुरी ने कहा-वो जिसके किनारे पे रहें प्यासे मुसाफ़िर, ऐसा कोई दरिया हमें दरिया नहीं लगता। सुरेंद्र नाज़ ने सुनाया-इक बार हमें आप कभी फ़ोन तो करते, ये बात अलग थी कि वो लगता नहीं लगता।
डॉ. सोहराब ककरालवी ने कहा-सोहराब इबादत में लचक भी है ज़रूरी, अकड़ी हुई गर्दन हो तो सजदा नहीं लगता। मुख्य अतिथि डॉ. मुनव्वर ताबिश संभली ने सुनाया—नामूसे मुहब्बत पे जो सर अपना कटाए, अब ऐसा किसी का भी कलेजा नहीं लगता। चांद ककरालवी ने पढ़ा-ये ईद मिलन कोई भला ईद मिलन है, मिलते हैं मगर सीने से सीना नहीं लगता।
देश में हास्य-व्यंग्य के मशहूर शायर नौशाद अनगढ़ ने खूब हँसाया-बेगम से लड़ाई में कहा भूरा ने सुन ले, ये काला-कलूटा मुझे मेरा नहीं लगता। समर बदायूँनी ने पढ़ा-यूँ ज़हर में डूबे हुए अल्फ़ाज़ पिए हैं, अब नीम का पत्ता हमें कड़वा नहीं लगता। निज़ाम नौशाही संभली ने बेहतरीन तरन्नुम में सुनाया-क्या मुर्दा ज़मीरी है कि इस दौर में हमसे, मुफ़लिस के जनाज़े को भी काँधा नहीं लगता।
संयोजक अरशद रसूल ने सुनाया-दिल साफ़ नहीं आपका तो कैसी इबादत, कसरत ही कहो इसको ये सजदा नहीं लगता। सिरसी से आए डॉ. शाकिर इस्लाही ने पढ़ा-ऐ मौजे बला-ख़ेज़ कहाँ छोड़ गई है, ये बीच समंदर है किनारा नहीं लगता। कुमार आशीष ने सुनाया-सब अपने गुनाहों की सज़ा भोग रहे हैं, दुनिया में कोई वक़्त का मारा नहीं लगता। डॉ. दानिश बदायूँनी ने कहा-दुश्मन ही नज़र आते हैं जिस सम्त भी देखो, इस शहर में अब कोई हमारा नहीं लगता।
डॉ. शम्स मुजाहिदी बदायूँनी ने पढ़ा-जिस दिन से छिड़ी मस्जिद-ओ-मंदिर की लड़ाई, उस दिन से मेरे गाँव में मेला नहीं लगता। ज़ाकिर ककरालवी ने पढ़ा-इक दौड़ती-फिरती हुई शमशान है दुनिया, सब ज़िंदा हैं और कोई भी ज़िंदा नहीं लगता। संचालक अजमत जीलानी ने सुनाया-उस शख़्स की तुम क़ुव्वते-बर्दाश्त तो देखो, प्यासा है बहुत फिर भी वो प्यासा नहीं लगता। वसीम अरहम संभली, डॉ. सय्यद इमरान सैदपुरी, कामिल उरौलवी बदायूँनी, सोहराब हैदर, मुबीन ककरालवी के कलाम को भी सराहा गया। कॉलेज के डायरेक्टर डॉ. शकील अहमद ने आभार व्यक्त किया। इस मौके पर पूर्व प्रधानाचार्य अब्दुल सुबूर ख़ान, शिक्षक नेता सरवर अली, आतिफ़ अंसारी, मसूद मियां, एहसान अली, खुर्शीद राजू, अरशद ग़ाज़ी, शहंशाह सकलैनी, आहिल रसूल, परवेज़ ख़ान, कौसर ग़ाज़ी, आफ़ाक़ अहमद आदि मौजूद रहे।
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लेखक के बारे में
पत्रकारिता में 10 वर्षों का अनुभव रखने वाले शारिक नसीर वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ के बदायूं ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं। क्षेत्रीय मुद्दों पर ज़मीनी पकड़ और तथ्यपरक कवरेज के साथ वह लगातार रिपोर्टिंग कर रहे हैं।
