कीचड़ में फंसी सरकार की योजनाएं, किसान-बेटियां रोज भुगत रहीं बदहाली
छपिया के किसान कल्याण केंद्र और कस्तूरबा विद्यालय तक पहुंचने के लिए डेढ़ सौ मीटर जलभराव से गुजरने की मजबूरी
उमेश श्रीवास्तव
- अधिकारियों को सूचना के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई
गोंडा। सरकार किसानों की आय बढ़ाने और बेटियों की शिक्षा को लेकर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। विकास खंड छपिया स्थित मल्टी परपज सीड स्टोर एंड टेक्नोलॉजी डिसेमिनेशन सेंटर (किसान कल्याण केंद्र) और कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय, मसकनवा तक पहुंचना आज भी किसी चुनौती से कम नहीं है। दोनों संस्थानों के मुख्य गेट तक करीब डेढ़ सौ मीटर का रास्ता जलभराव और कीचड़ से पटा है, जिससे रोज किसानों और छात्राओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
क्षेत्र के जनप्रतिनिधि विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन इन महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों की बदहाल तस्वीर उनके दावों पर सवाल खड़े कर रही है। किसान कल्याण केंद्र पर प्रतिदिन सैकड़ों किसान खाद, बीज और कीटनाशक लेने पहुंचते हैं। उन्हें गंदे पानी और कीचड़ से होकर गुजरना पड़ता है। कई बार किसान सामान समेत फिसलकर गिर जाते हैं, जिससे कपड़े खराब होने के साथ खाद-बीज और दवाओं के नुकसान की आशंका भी बनी रहती है।
ये खबर भी पढ़े : नोएडा में पत्नी के जाने के बाद 45 वर्षीय व्यक्ति ने की आत्महत्या, पुलिस जांच में जुटीइसी परिसर से सटे कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की छात्राओं की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। विद्यालय पहुंचने के लिए छात्राओं को रोज कीचड़ और जलभराव से गुजरना पड़ता है। आवासीय विद्यालय होने के कारण यहां खाद्य सामग्री और अन्य आवश्यक सामान भी नियमित रूप से आता है, लेकिन जलजमाव के कारण वाहनों और कर्मचारियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि लंबे समय से बनी इस समस्या की ओर संबंधित विभाग का ध्यान नहीं गया है। जलभराव के कारण संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा भी लगातार बना हुआ है, जिससे छात्राओं, किसानों और कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर भी संकट मंडरा रहा है। कृषि विभाग के गोदाम प्रभारी मनोज यादव ने बताया कि इस समस्या से जिला कृषि अधिकारी को अवगत कराया जा चुका है। बावजूद इसके अब तक समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
सरकार एक ओर किसानों को देश का अन्नदाता और बेटियों की शिक्षा को प्राथमिकता देने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर इन दोनों महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों तक पहुंचने का रास्ता ही बदहाली की कहानी बयां कर रहा है। बड़ा सवाल यह है कि जब किसान और छात्राएं सुरक्षित तरीके से अपने केंद्र और विद्यालय तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, तो विकास के दावों पर आखिर कैसे भरोसा किया जाए।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
