ग्रेट निकोबार पर टकराव: विकास या विनाश का सवाल,राहुल गांधी ने उठाए सवाल

रणनीतिक मेगा प्रोजेक्ट पर सियासत तेज, पर्यावरण और आदिवासी भविष्य दांव पर

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रमेश चंद्र

  • राहुल गांधी ने उठाए जंगल, जनजाति और पारदर्शिता पर तीखे सवाल
  • केंद्र का दावा-भारत की समुद्री ताकत और वैश्विक व्यापार के लिए गेम चेंजर

नई दिल्ली। हिंद महासागर के शांत विस्तार में बसे अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का ग्रेट निकोबार द्वीप इन दिनों राष्ट्रीय बहस का सबसे गर्म बिंदु बन चुका है। वजह है, करीब 80 हजार करोड़ रुपये की वह मेगा परियोजना, जिसे सरकार भारत के समुद्री और रणनीतिक भविष्य का ‘गेमचेंजर’ बता रही है, और जिसे विपक्ष, खासकर राहुल गांधी, पर्यावरणीय और मानवीय संकट की प्रस्तावना मान रहे हैं। 

सवाल सीधा है, लेकिन जवाब जटिल, क्या यह विकास का मॉडल है या विनाश की पटकथा? परियोजना का खाका महत्वाकांक्षी है-एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, पावर प्लांट और एक पूरी नई टाउनशिप। इसकी लोकेशन ही इसकी असली ताकत मानी जा रही है। मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब होने के कारण यहां बनने वाला पोर्ट वैश्विक समुद्री व्यापार के नक्शे पर भारत को नई पहचान दिला सकता है। फिलहाल एशिया में सिंगापुर जैसे हब इस रूट पर हावी हैं, और भारत लंबे समय से इस स्पेस में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। 

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सरकार का तर्क है कि ग्रेट निकोबार इस कमी को भर सकता है और साथ ही हिंद महासागर में भारत की सामरिक पकड़ को भी मजबूत करेगा।लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू कम बेचैन करने वाला नहीं है। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक इस प्रोजेक्ट के लिए बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित होगा। यह इलाका जैव विविधता का खजाना है, जहां कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। यहां की पारिस्थितिकी इतनी नाजुक है कि मामूली हस्तक्षेप भी दीर्घकालिक नुकसान का कारण बन सकता है। 2004 की सुनामी ने इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को पहले ही उजागर कर दिया था, ऐसे में भारी निर्माण गतिविधियों को लेकर आशंकाएं स्वाभाविक हैं।

सबसे संवेदनशील सवाल आदिवासी अस्तित्व का है। शोम्पेन जनजाति और निकोबारी जनजाति जैसे समुदाय सदियों से इस द्वीप के मूल निवासी हैं। उनका जीवन जंगल, जमीन और परंपरा से गहराई से जुड़ा है। विशेषज्ञों को डर है कि इस परियोजना के साथ आने वाला शहरीकरण और बाहरी दखल इन समुदायों की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना को झकझोर सकता है। राहुल गांधी ने इन्हीं मुद्दों को आधार बनाते हुए इसे ‘प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ अपराध’ करार दिया है। 

हालांकि उनके ‘सबसे बड़ा घोटाला’ वाले आरोप को अभी तक किसी आधिकारिक जांच में पुष्टि नहीं मिली है, लेकिन उन्होंने बहस को तेज जरूर कर दिया है। सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि परियोजना को सभी जरूरी पर्यावरणीय मंजूरियां मिल चुकी हैं और नुकसान को कम करने के लिए शर्तें तय की गई हैं। अधिकारियों का दावा है कि स्थानीय समुदायों के हितों की रक्षा के लिए योजनाबद्ध पुनर्वास और संरक्षण के उपाय किए जाएंगे।

दरअसल, ग्रेट निकोबार अब सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं रहा, यह भारत के विकास मॉडल की परीक्षा बन चुका है। एक तरफ आर्थिक आकांक्षाएं, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक जरूरतें हैं, तो दूसरी तरफ पर्यावरणीय संतुलन, आपदा का जोखिम और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा का सवाल। आखिरकार, यह बहस किसी एक पक्ष की जीत या हार से नहीं सुलझेगी। असली चुनौती यह है कि क्या भारत ऐसा रास्ता निकाल पाएगा, जहां विकास की रफ्तार भी बनी रहे और प्रकृति व परंपरा की कीमत भी न चुकानी पड़े। ग्रेट निकोबार इस संतुलन की सबसे कठिन परीक्षा है और फिलहाल, इसका नतीजा अभी बाकी है।

लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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