संपादकीय: वांगचुक बनाम सरकार! लोकतंत्र की हार या प्रशासनिक विवेक?
सरकार की चुप्पी और जबरन हटाने की कार्रवाई ने खड़े किये गंभीर सवाल
- भूख हड़ताल के 21वें दिन पुलिस द्वारा जबरन हॉस्पिटल ले जाया गया
सोनम वांगचुक के भूख हड़ताल को जबरिया समाप्त कराने को क्या माना जाये, लोकतंत्र की हार या प्रशासनिक विवेक? जंतर-मंतर, लोकतंत्र का प्रतीक स्थल, जहां नागरिक अपनी आवाज बुलंद करते हैं, एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। 18 जुलाई 2026 को जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षाविद सोनम वांगचुक को उनकी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के 21वें दिन पुलिस द्वारा हॉस्पिटल ले जाया गया।
साथ ही प्रदर्शनकारियों को स्थल खाली करने का निर्देश दिया गया। वांगचुक परीक्षा घोटालों, खासकर नीट पेपर लीक के मुद्दे पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे और लद्दाख के संवैधानिक अधिकारों (छठी अनुसूची, राज्यहुड आदि) के लिए भी संघर्षरत थे। सरकार का यह कदम लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। सोनम वांगचुक जैसे कार्यकर्ता भारत की सामाजिक चेतना के प्रतीक हैं।
लद्दाख की पर्यावरणीय संवेदनशीलता, सीमा सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण के मुद्दों पर उन्होंने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज उठाई है। उनका अनशन शांतिपूर्ण प्रतिरोध का माध्यम था। स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें चिकित्सकीय सहायता देना उचित है, लेकिन तरीका चिंताजनक है। दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश और मेडिकल सलाह पर यह कार्रवाई की गई।
फिर भी प्रदर्शनकारियों के आरोप कि दिल्ली पुलिस ने मेडिकल टीम का बहाना बनाया और जबरन हटाया, विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं। सरकार अगर अनशन समाप्त कराना ही चाहती थी तो मंत्री का इस्तिफा ही बेहतर विकल्प होता या वांगचुक से संवाद स्थापित कर उनकी मांगों पर गंभीर चर्चा की जा सकती थी। या फिर कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेकर, बिना धक्का-मुक्की के, उन्हें हॉस्पिटल शिफ्ट किया जा सकता था।
जंतर-मंतर खाली कराने की कवायद से लगता है कि सरकार प्रदर्शन को पूरी तरह कुचलना चाहती है, न कि समस्या का समाधान। यह दृष्टिकोण लोकतंत्र के खिलाफ है। संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) और (b) के तहत शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। जब सरकार इन अधिकारों को दबाती है, तो जनता में असंतोष बढ़ता है। परीक्षा घोटालों का मुद्दा गंभीर है। लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर है। नीट जैसे पेपर लीक से न केवल युवा पीढ़ी निराश हुई है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। वांगचुक का अनशन इन युवाओं की पीड़ा का प्रतीक बन गया था।
सरकार की चुप्पी और जबरन हटाने की कार्रवाई से लगता है कि वह जवाबदेही से बचना चाहती है। यदि मंत्री इस्तीफा देने लायक नहीं थे, तो कम से कम पारदर्शी जांच और सुधारों का वादा तो किया जा सकता था। यह घटना केवल एक कार्यकर्ता की नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की परीक्षा है। गांधीजी के अहिंसक अनशन की परंपरा में वांगचुक खड़े थे। उन्हें जबरन हटाना उस परंपरा का अपमान है। विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और नागरिक समाज को एकजुट होकर इस मुद्दे पर आवाज उठानी चाहिए।
मीडिया को भी निष्पक्ष रिपोर्टिंग करनी चाहिए, न कि सरकारी विज्ञप्तियों को ही प्रमुखता देनी चाहिए। सरकार को याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में शक्ति जनता से आती है, न कि दमन से। अनशनकर्ताओं को दबाने से समस्याएं हल नहीं होतीं, बल्कि गहरी होती हैं।
वांगचुक की मांगें शिक्षा सुधार और लद्दाख की सुरक्षा—राष्ट्रीय हित से जुड़ी हैं। इन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। जंतर-मंतर खाली कराने का फैसला अल्पकालिक राहत दे सकता है, लेकिन लंबे समय में जनअसंतोष को बढ़ावा देगा। सरकार को चाहिए कि वह संवाद का रास्ता अपनाए, मांगों पर विचार करे और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करे। अन्यथा, इतिहास ऐसे कदमों को लोकतंत्र की हार के रूप में दर्ज करेगा।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
