भूमि, जल,पौधे और जानवर: वस्तु नहीं, बल्कि जीवित समुदाय का हिस्सा है

केवल जरूरत भर लो ,बाकी छोड़ दो ताकि अगली पीढ़ी के लिए बच सके: मांगे राम चौहान 

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आधुनिक सभ्यता ने प्रकृति को संसाधनों की खान मान लिया है। जल को पाइपलाइन में बहने वाला पानी, जमीन को प्लॉट और स्क्वायर फीट, पौधों को फसल या लकड़ी, और जानवरों को मांस, दूध या मनोरंजन का साधन समझा जाता है। इस वस्तु-दृष्टि ने पर्यावरणीय संकट को जन्म दिया है।

लेकिन पर्यावरण विज्ञान, पारिस्थितिकी और आदिवासी ज्ञान हमें सिखाते हैं कि जल, जमीन, पौधे और जानवर अलग-अलग वस्तुएँ नहीं, बल्कि एक जीवित समुदाय हैं।एल्डो लियोपोल्ड ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक A Sand County Almanac में “Land Ethic” की अवधारणा दी। उनके अनुसार भूमि केवल मिट्टी नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले सभी जीवों—पौधों, कीटों, पक्षियों, स्तनधारियों और सूक्ष्म जीवों—का एक जटिल समुदाय है। इस समुदाय में हर सदस्य का अपना स्थान और योगदान है। मिट्टी के सूक्ष्म जीव पौधों को पोषण देते हैं, पौधे जानवरों को भोजन और आश्रय, जानवर बीज प्रसार और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखते हैं। यह चक्र निरंतर चलता रहता है।जल भी एक जीवित समुदाय है। नदी सिर्फ पानी की धारा नहीं होती। उसमें बैक्टीरिया, शैवाल, मछलियाँ, जलपक्षी और किनारे के पेड़-पौधे एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। गंगा, यमुना या कोई छोटी नदी अपने किनारे के गांवों, जंगलों और खेतों के साथ एक पूरी इकाई है। जब हम नदी को प्रदूषित करते हैं या बांध बनाकर उसकी धारा रोकते हैं, तो हम पूरे समुदाय को चोट पहुँचाते हैं।

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पौधे स्थिर सदस्य हैं। वे सूर्य की ऊर्जा को भोजन में बदलते हैं, ऑक्सीजन देते हैं, मिट्टी को बांधे रखते हैं और हवा को शुद्ध करते हैं। एक जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि छत्र , भूमि स्तर, जड़ों का नेटवर्क और सहजीवी फंगी का एक जटिल सामाजिक ढांचा है। एक पेड़ कटने पर केवल वह पेड़ नहीं मरता, बल्कि उस पर निर्भर सैकड़ों जीव प्रभावित होते हैं।जानवर इस समुदाय के गतिशील सदस्य हैं। वे परागण, बीज प्रसार, शिकार-शिकारी संतुलन और पोषक चक्र को बनाए रखते हैं। शेर का गायब होना हिरणों की संख्या बढ़ा देता है, जो फिर पौधों को नष्ट कर देते हैं, जिससे मिट्टी का कटाव होता है और अंततः पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ जाता है।

यह समुदाय-दृष्टि आदिवासी संस्कृतियों में सदियों से विद्यमान है। भारतीय आदिवासी समुदाय पेड़ को कुलदेवता मानते हैं, नदी को माता कहते हैं और जमीन को धरती माता। वे उपयोग करते हैं लेकिन शोषण नहीं। उनकी पूजा और रीति-रिवाज इस समुदाय के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं।

आज जल संकट, मिट्टी की उर्वरता का ह्रास, जैव विविधता का विनाश और जलवायु परिवर्तन इसी वस्तु-दृष्टि का परिणाम हैं। जब हम प्रकृति को माल की तरह देखते हैं, तो हम अपने आप को भी अलग कर लेते हैं। लेकिन हम इस समुदाय का हिस्सा हैं। हमारा स्वास्थ्य, भोजन, हवा और भावी पीढ़ी इसी समुदाय पर निर्भर है।

समुदाय-दृष्टि अपनाने का अर्थ है नैतिक जिम्मेदारी। हम उपयोग कर सकते हैं, लेकिन अत्यधिक नहीं। संरक्षण, पुनर्स्थापना और सह-अस्तित्व हमारा कर्तव्य बन जाता है। वन रोपण, नदी सफाई, जैविक खेती और वन्यजीव संरक्षण इसी दृष्टि के व्यावहारिक रूप हैं।

अंत में, जब हम जल, जमीन, पौधे और जानवरों को जीवित समुदाय मान लेंगे, तभी हम सच्चे अर्थों में पर्यावरण रक्षक बन पाएंगे। यह बदलाव केवल नीति का नहीं, बल्कि हमारी सोच, संस्कृति और दैनिक व्यवहार का होना चाहिए। तभी हम एक संतुलित, सम्मानजनक और टिकाऊ भविष्य की ओर बढ़ सकेंगे।

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लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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