पौधे तो खुब लग रहे पर दरख्त नहीं बन पाएं
कम हुआ पीपल, नीम और बरगद के पौध लगाने का चलन, , घट रहा जलस्तर
लखनऊ । एक वृक्ष दस पुत्र समान' कहावत बहुत पुरानी है लेकिन आज वृक्षों की संख्या में निरंतर कमी आ रही है। वृक्षारोपण के प्रति सरकारी विभागों में तो रुझान बढ़ रहा है लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में इसे लेकर कोई खास उत्साह नहीं है। वहीं पीपल, पाकर,बरगद के पौध रोपण को लेकर सरकार का भी कोई ध्यान नहीं है। जबकि जबकि ये पेड़ आक्सीजन के सबसे अच्छे उत्पादक हैं। योगी सरकार में प्रदेश में 242 करोड़ पौधे लगाने का रिकार्ड कायम किया गया। सवाल यह है कि जब इतनी तादाद में पौध रोपण हो रही है तो जलस्तर क्यों नीचे जा रहा हैं। साथ ही जलवायु परिवर्तन भी बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। भारी भरकम पौध रोपण पेड़ों को दरख्त नहीं बना पा रहा है।
पहले लोग अपने घरों के सामने नीम का पेड़ लगाते थे। क्योंकि ये पेड़ औषधीय गुणों की खान है। यह भी मान्यता थी कि नीम के पेड़ के नीचे सोते थे और बीमार नही पड़ते थे। लेकिन अब कोई नीम का पौधा लगाने की सोचता तक नहीं। शीशम के पेड़ की लकड़ी की मांग लगातार बढ़ रही जिसे दूसरे राज्यों से मंगाना पड़ता है। यह सब क्यों है, इस दिशा में सोचने की किसी को फुर्सत नहीं। सरकारी फरमान इतने कड़े हैं कि लोग इन पेड़ों को मुसीबत मानने लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि ऐसा पेड़ क्यों लगाये जिसके स्वामी होने के बावजूद न काटने की छूट न बेचने की। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग केवल यूके लिप्ट्स जैसे पेड़ लगाते हैं क्योंकि इन्हें काटने में झंझट नही।
वन विभाग से परमिशन लेने जाएं तो इतनी औपचारिकता की पूरी करना आसान नहीं। एक पेड़ के बदले दस लगाने के वादे के बाद भी परमिट आसान नहीं। जब कोई अधिकार नही तो मालिकाना हक भी बेमतलब ही तो है। प्रदेश सरकार ने एक दिन में 35 करोड़ पौधे रोपित करा दिया है। सरकारी दावा है कि बीते नौ साल में वृक्षारोपण का आंकड़ा 242 करोड़ पार कर चुका है। हम जो पौधे लगाते हैं लेकिन उनमें से दरख्त यानि वृक्ष कितने बनते हैं, इस ओर शायद किसी जिम्मेदार ओहदेदार की नजर नहीं। पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकारी और गैरसरकारी सभी मंचों से वृक्षारोपण की वकालत की भी जाती है मगर नतीजा ढाक के तीन पात। वृक्षों की कटान पर सख्ती बहुत है लेकिन कटते भी कम नहीं। जल स्तर में निरंतर गिरावट आती जा रही है। पानी बिना जिंदगानी भी संभव नहीं। धरती के नीचे का भी जल घट गया है। जल स्तर ऐसे ही घटता रहा तो जनजीवन प्रभावित होने से रोका नहीं जा सकेगा। हम भावी पीढ़ी को क्या देकर जाना चाहते हैं, यह सोचनीय विषय है।यह सामूहिक जिम्मेदारी है जो निभानी पड़ेगी। पौधा लगे तो दरख्त जरूर बने,यह ज्यादा जरूरी है।
वृक्ष का मालिक अपनी मर्जी के मालिक जब तक नही होगा तब तक वृक्षारोपण अभियान केवल कागजी रहेगा। वन विभाग सर्वाधि पौध रोपण करता है और काटने की अनुमति भी देता है। पेड़ काटने की अनुमति आसान नहीं घर के दरवाजे चाहे गिर जाए लेकिन पेड़ काटने की परमिशन नही मिलने वाली है। जानमाल की हानि होने का अंदेशा हो फिर भी सुनवाई नहीं, तो क्या करें।
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लेखक के बारे में
राजेश कुमार सिंह को पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 26 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बीएससी, एलएलबी और मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। वर्तमान में वह हिंदी दैनिक ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं। राजनीतिक, प्रशासनिक और शासन से जुड़े विषयों पर उनकी गहरी समझ है।
