एनटीएफ रिपोर्ट में खुलासा, डिग्रियों के बोझ तले दम तोड़ते छात्रों के सपने!

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भारी कमी, शिकायत तंत्र और संस्थागत संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल

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विवेक श्रीवास्तव

  • एनटीएफ की रिपोर्ट ने कैंपसों की भयावह मानसिक स्वास्थ्य तस्वीर उजागर की हर तीन में एक छात्र खुद को अकेला महसूस कर रहा, नौ प्रतिशत ने आत्महत्या के विचार स्वीकारे

लखनऊ/ नई दिल्ली। देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय और कॉलेज, जहां भविष्य के वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी और शोधकर्ता तैयार होते हैं, वहीं आज हजारों छात्र मानसिक दबाव और अकेलेपन से जूझ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित राष्ट्रीय कार्यबल (एनटीएफ) की अंतरिम रिपोर्ट बताती है कि छात्र आत्महत्याएं किसी एक वजह का नतीजा नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की कई गंभीर खामियों का संयुक्त परिणाम हैं।

रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि यदि समय रहते सुधार नहीं हुए तो डिग्री देने वाले संस्थान छात्रों की जिंदगी बचाने में असफल साबित होंगे।उच्चतम न्यायालय ने 24 मार्च 2025 को उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट की अध्यक्षता में राष्ट्रीय कार्यबल का गठन किया था। कार्यबल का दायित्व छात्र आत्महत्याओं के प्रमुख कारणों की पहचान करना, मौजूदा कानूनों और संस्थागत व्यवस्थाओं की समीक्षा करना तथा प्रभावी रोकथाम और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सुधारों की सिफारिश करना है।

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न्यायालय ने 27 मई 2026 के आदेश में कार्यबल को अपनी अंतिम रिपोर्ट 31 अक्टूबर 2026 तक सौंपने का समय दिया है। कार्यबल ने मई 2025 से अब तक देश के 10 राज्यों के 30 उच्च शिक्षण संस्थानों का निरीक्षण किया और 2.43 लाख से अधिक छात्रों से संवाद किया। रिपोर्ट में सामने आया कि 34 प्रतिशत छात्र अपने ही कैंपस में खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं। 15 प्रतिशत छात्र लंबे समय तक तनाव, अवसाद और चिंता से जूझ रहे हैं, जबकि नौ प्रतिशत छात्रों ने स्वीकार किया कि पिछले एक वर्ष में उनके मन में कई बार आत्महत्या के विचार आए।

रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन संस्थानों पर छात्रों को मानसिक सहारा देने की जिम्मेदारी है, वहीं बुनियादी व्यवस्था तक मौजूद नहीं है। सर्वेक्षण में शामिल 70 प्रतिशत से अधिक संस्थानों में पूर्णकालिक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ नहीं मिले। केवल 20 प्रतिशत संस्थानों का विशेषज्ञों से औपचारिक जुड़ाव है और महज चार प्रतिशत संस्थानों में आत्महत्या जैसी आपात स्थितियों से निपटने की स्पष्ट कार्ययोजना (एसओपी) उपलब्ध है।

छात्रों ने कार्यबल के सामने जो समस्याएं रखीं, वे केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं हैं। कठोर उपस्थिति नियम, लगातार बढ़ता शैक्षणिक दबाव, जातिगत और लैंगिक भेदभाव, छात्रवृत्ति में देरी, शिक्षकों की कमी, खराब छात्रावास, निष्क्रिय शिकायत निवारण तंत्र और काउंसलिंग सेवाओं का अभाव छात्रों को भीतर ही भीतर तोड़ रहा है। कई छात्रों ने यह भी कहा कि शिकायत करने पर समाधान मिलने की बजाय उन्हें अनसुना कर दिया जाता है।

राष्ट्रीय कार्यबल ने माना है कि छात्र आत्महत्या को केवल व्यक्तिगत मानसिक कमजोरी मानना बड़ी भूल होगी। यह संस्थागत संस्कृति, सामाजिक भेदभाव, आर्थिक दबाव और प्रशासनिक उदासीनता का भी परिणाम है। इसलिए रिपोर्ट में प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में प्रशिक्षित काउंसलर नियुक्त करने, प्रभावी मानसिक स्वास्थ्य सहायता केंद्र स्थापित करने, शिकायत निवारण व्यवस्था को जवाबदेह बनाने, छात्र-शिक्षक संवाद बढ़ाने और भेदभाव के खिलाफ सख्त कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

यह रिपोर्ट सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन और समाज-तीनों के लिए चेतावनी है। देश की युवा आबादी तभी राष्ट्रीय शक्ति बन सकती है, जब उसके सपनों के साथ उसकी मानसिक सेहत भी सुरक्षित हो। यदि विश्वविद्यालय केवल परिणाम और प्लेसमेंट तक सीमित रहे और छात्रों की भावनात्मक सुरक्षा की अनदेखी होती रही, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा सकता है। अब जरूरत सिर्फ नई नीतियों की नहीं, बल्कि ऐसे संवेदनशील कैंपस बनाने की है जहां हर छात्र यह महसूस करे कि वह अकेला नहीं है।

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लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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