शाहदरा के अम्बेडकर कैंप में ‘चूल्हा संकट’: गैस सिलेंडर के लिए जूझती ज़िंदगी, महंगाई ने तोड़ी कमर
बुकिंग के बावजूद नहीं मिल रहा सिलेंडर, कालाबाज़ारी के आरोप-दिहाड़ी मजदूरों के सामने रोज़ी-रोटी का गंभीर संकट
लायक हुसैन
गाजियाबाद। राजधानी दिल्ली के शाहदरा स्थित अम्बेडकर कैंप में इन दिनों ज़िंदगी एक नए संकट से जूझ रही है। यहां रहने वाली महिलाओं की आंखों में बिखरे दर्द की कहानी किसी से छिपी नहीं है। उनके घरों के आसपास बिखरे फूल मानो उनके जीवन के उन कांटों का प्रतीक बन चुके हैं, जिनसे वे रोज़ दो-चार हो रही हैं।
अम्बेडकर कैंप की महिलाओं का कहना है कि उनका जीवन हमेशा संघर्षों से भरा रहा है, लेकिन अब रसोई का संकट उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। गैस सिलेंडर की भारी किल्लत ने हालात को और गंभीर बना दिया है। उनका आरोप है कि गैस बुकिंग कराने के बावजूद समय पर सिलेंडर नहीं मिल रहा है, जबकि खुलेआम कालाबाज़ारी हो रही है।
ये खबर भी पढ़े : मुख्यमंत्रियों को हटाए जाने का बयान देने वाले अखिलेश को ओमप्रकाश राजभर ने दिखाया आईनास्थानीय महिलाओं के मुताबिक, जो छोटा सिलेंडर पहले करीब 500 रुपये में मिल जाता था, वह अब 1500 रुपये तक बेचा जा रहा है, जबकि बड़े सिलेंडर की कीमत 4000 रुपये तक पहुंच गई है। ऐसे में रोज़ाना 200 से 300 रुपये कमाने वाले दिहाड़ी मजदूरों के लिए गैस सिलेंडर खरीदना नामुमकिन सा हो गया है।
महिलाओं ने यह भी आरोप लगाया कि जिन लोगों के पास पैसा है, उन्हें डिलिवरी बॉय और बिचौलियों के माध्यम से तुरंत सिलेंडर मिल जाता है, जबकि गरीब परिवार कई-कई दिनों तक इंतजार करने को मजबूर हैं। इस असमानता ने व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
ये खबर भी पढ़े : लखनऊ अग्निकांड के बाद प्रयागराज मंडल में 10 कोचिंग सील, सुरक्षा मानकों से समझौता बर्दाश्त नहीं : सौम्या अग्रवालरसोई की इस समस्या का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ रहा है। महिलाओं का कहना है कि समय पर खाना और नाश्ता न बन पाने की वजह से बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, जिससे उनका भविष्य भी प्रभावित हो रहा है।
जनसेवक टीम की प्रमुख निगार फारूखी से अपनी व्यथा साझा करते हुए महिलाओं ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि जमीनी हकीकत को समझे बिना 'कोई संकट नहीं' कह देना उनकी समस्याओं का मज़ाक उड़ाने जैसा है।
अम्बेडकर कैंप की यह तस्वीर न सिर्फ एक बस्ती की कहानी है, बल्कि उस सच्चाई को उजागर करती है, जहां महंगाई और अव्यवस्था के बीच गरीब का चूल्हा ठंडा पड़ता जा रहा है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार विभाग इस संकट को कितनी गंभीरता से लेते हैं और कब तक इन परिवारों के घरों में फिर से चूल्हा जल पाता है।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
