वित्तीय तंगी का बहाना बनाकर पेंशन नहीं रोकी जा सकती, हाईकोर्ट ने भुगतान के दिए आदेश
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि कोई भी सरकारी निगम या विभाग वित्तीय तंगी का हवाला देकर सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन या उनके परिवारों की पारिवारिक पेंशन नहीं रोक सकता।
अदालत ने कहा कि समय पर पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ देना संबंधित संस्थान की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है।
न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने दिवंगत कर्मचारी के कानूनी वारिसों की ओर से दायर याचिका स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। मामला एक सरकारी निगम में प्रोडक्शन मैनेजर के पद पर कार्यरत कर्मचारी से जुड़ा था।
कर्मचारी ने 24 सितंबर 2001 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। उस समय राज्य सरकार के स्वामित्व वाले निगमों में 1 अप्रैल 1999 से 2 दिसंबर 2004 तक लागू विशेष कॉरपोरेट सेक्टर पेंशन योजना प्रभावी थी। अदालत ने माना कि कर्मचारी इस योजना के तहत पेंशन पाने के पूरी तरह पात्र थे।
पेंशन का भुगतान नहीं होने पर कर्मचारी की पत्नी ने वर्ष 2022 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान उनकी भी मृत्यु हो गई। इसके बाद अदालत ने उनके बच्चों को कानूनी वारिस के रूप में याचिका में शामिल किया और मामले की सुनवाई आगे बढ़ी।
सुनवाई के दौरान संबंधित निगम ने अदालत में स्वीकार किया कि कर्मचारी का पेंशन का दावा सही है, लेकिन निगम वित्तीय तंगी से गुजर रहा है और इसी कारण भुगतान नहीं कर पाया।
इस दलील पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि यदि सरकारी निगम वर्षों तक अपने कर्मचारियों को उनका वैधानिक अधिकार नहीं दे पा रहे हैं, तो यह गंभीर स्थिति है।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि वर्ष 2009 में भी पेंशनरों को वित्तीय तंगी का हवाला देकर परेशान किया जा रहा था और लगभग दो दशक बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।
अदालत ने कहा कि इससे यह प्रतीत होता है कि या तो ऐसे सरकारी निगम केवल "सफेद हाथी" बनकर रह गए हैं या फिर वे अपने सेवानिवृत्त कर्मचारियों को उनका अधिकार देने के प्रति गंभीर नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी कर्मचारी का अधिकार पूरी तरह स्थापित हो चुका है, तब कागजी प्रक्रियाओं और धन की कमी का हवाला देकर उसके परिवार को लंबे समय तक न्याय से वंचित रखना उचित नहीं है।
अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित निगम की कार्यप्रणाली को कानून के अनुरूप नहीं माना और आदेश दिया कि दिवंगत कर्मचारी की सेवानिवृत्ति की तारीख से लेकर उनके निधन तक की पूरी बकाया पेंशन तीन महीने के भीतर उनके कानूनी वारिसों को दी जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि तीन महीने के भीतर भुगतान कर दिया जाता है तो निगम को कोई ब्याज नहीं देना होगा।
यदि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया गया तो वर्ष 2022 में याचिका दायर होने की तारीख से वास्तविक भुगतान की तिथि तक छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ पूरी राशि का भुगतान करना होगा।
लेखक के बारे में
माही खान एक उभरती हुई कंटेंट राइटर हैं और वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ से जुड़कर डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए समाचार अपडेट का कार्य कर रही हैं। वह खबरों की प्रस्तुति पर विशेष ध्यान देती हैं और मीडिया क्षेत्र में सीखते हुए अपने लेखन कौशल को लगातार विकसित कर रही हैं।
