लोकसभा में ज्यादा वोट पाकर भी क्यों फेल हो गया महिला आरक्षण बिल, जानें अब आगे क्या?

Published By Shishir Patel
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नई दिल्ली । महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक शुक्रवार को लोकसभा में पारित नहीं हो सका। सदन में 'संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026', पर हुए मत विभाजन के दौरान इसके पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। मतदान के समय सदन में कुल 528 सांसद मौजूद थे। ऐसे में विधेयक पारित कराने के लिए सत्ता पक्ष को 352 वोटों की जरूरत थी। विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार को दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी। जिसके कारण अधिक वोट मिलने के बाद भी बिल फेल हो गया।

पिछले 12 सालों में पहली बार गिरा कोई संशोधन विधेयक

पिछले 12 सालों में यह पहला मौका है जब मोदी सरकार का कोई संविधान संशोधन बिल सदन में गिरा है। देश की आधी आबादी को उनका राजनीतिक हक दिलाने के लिए शुक्रवार शाम लोकसभा में वोटिंग हुई। सरकार ने इस बिल को पारित कराने के लिए हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन यह बिल पारित कराने के लिए जरूरी आंकड़ा, 352 से 54 वोट पीछे रह गई। कुल मौजूद सदस्य 352 में बिल के खिलाफ 230 वोट पड़े और कहानी यहीं पर समाप्त हो गई।

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विपक्ष ने एक ऐतिहासिक मौका गंवा दिया-रिजिजू

किरेन रिजिजू ने महिला आरक्षण विधेयक के सदन में गिरने को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि मौका गंवा दिया गया है। रिजिजू ने कहा कि यह महिलाओं को सम्मान और अधिकार देने से जुड़ा ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण विधेयक था। इसी पर यह नतीजा आया है। विपक्ष ने इसमें साथ नहीं दिया। बहुत खेद की बात है। आपने एक ऐतिहासिक मौका गंवा दिया। महिलाओं को सम्मान और अधिकार देने का हमारा अभियान जारी रहेगा और हम उन्हें अधिकार दिलाकर ही रहेंगे।

बाकी दो विधेयकों पर क्यों नहीं हुई वोटिंग

सरकार ने इस विधेयक के साथ 'परिसीमन विधेयक, 2026' और 'संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026' को भी सदन में चर्चा और पारित कराने के लिए रखा था, लेकिन उन्हें भी आगे नहीं बढ़ाया जा सका। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि संविधान संशोधन विधेयक के पारित नहीं होने के बाद अब इससे संबंधित दोनों विधेयकों 'परिसीमन विधेयक, 2026' और 'संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026' को आगे नहीं बढ़ा सकते।

बिल में क्या था प्रस्ताव?

संविधान संशोधन विधेयक के तहत 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 तक करने का प्रस्ताव था। साथ ही 2029 के आम चुनावों से पहले महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की योजना शामिल थी। इसके अलावा, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी महिलाओं के लिए सीटें बढ़ाने का प्रावधान रखा गया था, ताकि आरक्षण को प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके।

विपक्ष क्यों है नाराज?

इस पूरे मामले में एक और बड़ा मुद्दा परिसीमन यानी डिलीमिटेशन को लेकर भी सामने आया। सरकार चाहती थी कि लोकसभा की सीटों का पुनर्निर्धारण करके महिला आरक्षण को लागू किया जाए, जबकि विपक्ष ने इसका विरोध किया। विपक्ष का तर्क था कि परिसीमन के जरिए कुछ राज्यों को फायदा और कुछ को नुकसान हो सकता है, इसलिए इसे तुरंत लागू करना उचित नहीं होगा। इसी मुद्दे पर विपक्ष एकजुट हो गया और बिल को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका।

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लेखक के बारे में

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पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।

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