संसद का मानसून सत्रः हंगामे नहीं, समाधान का संकल्प बने -ललित गर्ग
20 जुलाई से प्रारंभ होगा संसद का मानसून सत्र
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"संसद: केवल कानून बनाने का नहीं, लोकतांत्रिक विमर्श का भी सर्वोच्च मंच"
भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा बल उसकी संसद है। यही वह मंच है जहां देश की आकांक्षाएं, समस्याएं और भविष्य की दिशा तय होती है। संसद केवल कानून बनाने का स्थान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श, जवाबदेही और जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सर्वाेच्च मंच है। ऐसे में 20 जुलाई से प्रारंभ हो रहा संसद का मानसून सत्र केवल एक संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परिपक्वता की नई परीक्षा भी है। देश की जनता की अपेक्षा है कि यह सत्र शोर-शराबे, आरोप-प्रत्यारोप और गतिरोध का नहीं, बल्कि सार्थक संवाद, गंभीर बहस और ठोस निर्णयों का सत्र बने। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में संसद के दृश्य लोकतांत्रिक गरिमा की अपेक्षा राजनीतिक टकराव के प्रतीक अधिक दिखाई दिए हैं।
सदन में नीति और नीयत पर चर्चा कम तथा नारे, तख्तियां, वेल में प्रदर्शन और कार्यवाही बाधित करने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती रही है। संसद का प्रत्येक मिनट जनता के कर से चलता है, इसलिए उसका अनुत्पादक होना केवल संसदीय विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संसाधनों का भी दुरुपयोग है। संसद का उद्देश्य सरकार को घेरना अवश्य है, लेकिन केवल हंगामा खड़ा करना नहीं; उसी प्रकार सरकार का दायित्व केवल बहुमत के बल पर निर्णय लेना नहीं, बल्कि विपक्ष की बात सुनना और संवाद के लिए वातावरण बनाना भी है।
इस बार विपक्ष के पास अनेक ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर वह सरकार को घेरने की तैयारी में है। प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, शिक्षा व्यवस्था, महंगाई, बेरोजगारी, विदेश नीति, सीमा सुरक्षा, धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद, मन्दिरों में चोरी, कर व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया जैसे विषय निश्चित रूप से राष्ट्रीय महत्व के हैं। इन पर संसद में गंभीर चर्चा होना लोकतंत्र की आवश्यकता भी है और जनता का अधिकार भी। लेकिन यदि ये विषय केवल राजनीतिक नारेबाजी का माध्यम बनकर रह जाएं, तो उनका उद्देश्य समाप्त हो जाएगा। संसद में उठाया गया प्रत्येक मुद्दा समाधान की दिशा में बढ़े, यही लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रमाण होगा।
विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य स्तंभ है। उसका दायित्व केवल सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार को बेहतर निर्णय लेने के लिए प्रेरित करना भी है। स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष सरकार की आंख और कान दोनों होता है। यदि वह केवल विरोध की राजनीति तक सीमित हो जाए, तो उसकी विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। दूसरी ओर सरकार भी यदि विपक्ष के प्रत्येक प्रश्न को राजनीतिक षड्यंत्र मानकर संवाद से बचती है, तो लोकतंत्र का संतुलन कमजोर पड़ता है। इसलिए सत्ता और विपक्ष, दोनों को अपने-अपने दायित्वों का गंभीरता से निर्वहन करना होगा।
मानसून सत्र में यदि शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा होती है तो उसका केंद्र छात्रों का भविष्य होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक लाभ। यदि महंगाई पर बहस हो तो उसका उद्देश्य आम नागरिक को राहत देने वाली नीतियों पर विचार होना चाहिए। यदि राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति अथवा सीमा संबंधी विषय उठते हैं तो उनमें दलगत राजनीति के बजाय राष्ट्रीय हित सर्वाेपरि होना चाहिए।
संसद की बहस तब सार्थक कही जाएगी, जब उससे नीति निर्माण की दिशा निकले और जनता को यह विश्वास हो कि उसकी समस्याओं पर गंभीरता से विचार हो रहा है। लोकतंत्र में बहस और असहमति कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। किंतु जब असहमति का स्थान अवरोध ले लेता है और बहस की जगह बहिष्कार आ जाता है, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि संसद को चलाना ही लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी है। यह विचार आज पहले से अधिक प्रासंगिक है। संसद का ठप होना किसी एक दल की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की हार है।
इस समय देश अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। युवाओं को रोजगार चाहिए, किसानों को बेहतर आय की अपेक्षा है, मध्यम वर्ग महंगाई से परेशान है, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की जरूरत है तथा वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के बीच भारत को अपनी विकास गति बनाए रखनी है। ऐसे समय संसद से जनता समाधान चाहती है, संघर्ष नहीं। यदि पूरा सत्र केवल राजनीतिक टकराव में बीत गया तो सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक का होगा, जिसकी आवाज संसद तक पहुंचनी चाहिए। संसद की गरिमा केवल अध्यक्ष की कुर्सी या ऐतिहासिक भवन से नहीं बनती, बल्कि वहां बैठने वाले जनप्रतिनिधियों के आचरण से बनती है। सांसदों को यह स्मरण रखना चाहिए कि वे केवल अपने दल के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि देश की जनता के प्रतिनिधि हैं। संसद में उनका प्रत्येक शब्द और प्रत्येक व्यवहार लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा बनता है। इसलिए व्यक्तिगत आरोपों और कटुता के स्थान पर तथ्यों, तर्कों और नीति आधारित विमर्श को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
भारतीय जनता पार्टी का यह दावा रहा है कि वह विकास, सुशासन और नीति आधारित राजनीति में विश्वास रखती है। यदि ऐसा है तो उसे विपक्ष द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण प्रश्नों का तथ्यात्मक उत्तर देने में संकोच नहीं होना चाहिए। वहीं विपक्ष को भी यह समझना होगा कि केवल नारे लगाने अथवा कार्यवाही बाधित करने से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता। उसे वैकल्पिक नीतियां, ठोस सुझाव और रचनात्मक आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।
लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों की सफलता संसद की सफलता से जुड़ी होती है। आज सूचना क्रांति के युग में जनता सब कुछ देख और समझ रही है। संसद में कौन बहस कर रहा है, कौन केवल राजनीतिक प्रदर्शन कर रहा है और कौन जनहित के प्रश्न उठा रहा है, इसका मूल्यांकन मतदाता स्वयं करता है। इसलिए अब केवल प्रतीकात्मक राजनीति से काम नहीं चलेगा।
जनप्रतिनिधियों को अपने दायित्वों का निर्वहन अधिक गंभीरता, संवेदनशीलता और जवाबदेही के साथ करना होगा। दार्शनिक एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि संसद राष्ट्र के विवेक की आवाज होती है। यदि यही विवेक शोर में दब जाए तो लोकतंत्र का मार्ग भी धुंधला पड़ जाता है। इसलिए मानसून सत्र को ऐसे अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए, जहां सत्ता और विपक्ष मिलकर यह संदेश दें कि लोकतंत्र की असली शक्ति संवाद, सहमति और सार्थक बहस में निहित है।
किसी भी आदर्श एवं मजबूत लोकतंत्र की अपेक्षा है विपक्ष का समक्ष एवं सकारात्मक सक्रिय होना। क्योंकि विपक्ष लोकतंत्र की आंख है। लेकिन जब यह आंख केवल अंधविरोध में अंधी हो जाए, तो लोकतंत्र की दृष्टि धुंधली हो जाती है। जनता का दबाव ही विपक्ष को सद्बुद्धि दे सकता है। जब जनता यह स्पष्ट रूप से जताए कि उसे रचनात्मक, नीति आधारित विपक्ष चाहिए न कि नारेबाज नेता, तब विपक्ष को भी सुधरना पड़ेगा।
विपक्ष को आत्मचिंतन करना चाहिए कि क्या वह जनता की लड़ाई लड़ रहा है या केवल सत्तालोलुपता की राजनीति कर रहा है? मीडिया को चाहिए कि वह हंगामे को महिमामंडित करने के बजाय, नीति और तर्क आधारित बहस को आगे बढ़ाए। संसद में विवाद होना लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन वही विवाद अगर दिशा विहीन हो जाए, तो वह कमजोरी बन जाता है। आज जरूरत है कि संसद की गरिमा को पुनर्स्थापित किया जाए, विपक्ष अपनी भूमिका को गंभीरता से निभाए और सरकार भी अहंकार छोड़कर संवाद को अवसर दे। संसद यदि सचमुच “लोक का मंदिर” है, तो वहाँ केवल सत्ता की पूजा नहीं, लोकमंगल की बात होनी चाहिए, यही मानसून सत्र से बड़ी अपेक्षा है।
इस सत्र में संसद का समय नीति निर्माण में ही लगे, वहां कार्यवाही स्थगित न हो। जनप्रतिनिधि जिन मुद्दों एवं उद्देश्यों को लेकर चुने जाते हैं, वे उन मुद्दों एवं उद्देश्यों पर खरे साबित हो। देश की जनता चाहती है कि संसद संकल्प का मंच बने, संग्राम का नहीं। सरकार विपक्ष की बात सुने, विपक्ष सरकार को जवाबदेह बनाए, लेकिन दोनों का अंतिम लक्ष्य राष्ट्रहित और जनकल्याण ही रहे।
यदि इस मानसून सत्र में राजनीतिक कटुता के स्थान पर नीति आधारित विमर्श, आरोपों के स्थान पर उत्तरदायित्व और गतिरोध के स्थान पर समाधान का वातावरण बनता है, तो यह केवल संसदीय सफलता नहीं होगी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का नया अध्याय भी सिद्ध होगा। संसद तब ही वास्तव में लोकतंत्र का मंदिर कहलाएगी, जब उसकी प्रत्येक आवाज देश के अंतिम व्यक्ति की आशाओं और अपेक्षाओं को अभिव्यक्ति दे सके।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
