अजोला की खेती से कम हो जाएगी धान की खेती की लागत और मिट्टी की भी सुधरेगी सेहत
धान की खेती: धान की खेती में बढ़ती लागत किसानों के लिए बड़ी समस्या बन रही है. खासतौर पर यूरिया और दूसरे खाद पर बढ़ता खर्च किसानों की जेब पर भी असर डालता है. ऐसे में कृषि वैज्ञानिक किसानों को अजोला के इस्तेमाल की सलाह देते हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार अजोला एक नेचुरल जैविक खाद है जो धान के फसल को जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत सुधारने में भी मदद करता है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं की धान रोपने के बाद अजोला खेत में क्यों छोड़ देते हैं और इससे खेती की लागत कैसे कम होती है और मिट्टी की सेहत कैसे सुधरेगी.
क्या है अजोला?
अजोला एक छोटा जल में उगने वाला पौधा है, जो पानी की सतह पर तेजी से फैलता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह वातावरण में मौजूद नाइट्रोजन को अवशोषित कर उस फसल के जरिए उपयोगी रूप में बदल देता है. इसी कारण इसे जैविक उर्वरक माना जाता है.
धान के खेत में कैसे किया जाता है इस्तेमाल?
एक्सपर्ट्स के अनुसार धान की रोपाई के लगभग 15 से 20 दिन बाद खेत में अजोला डाला जाता है. खेत में पर्याप्त पानी होने पर अजोला पानी की सतह पर फैलने लगता है. यह धीरे-धीरे बढ़ता है और नाइट्रोजन सहित कई पोषक तत्व मिट्टी में छोड़ता रहता है. जब अजोला बढ़ता है तो यह हरी खाद की तरह काम करता है और मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाता है.
कैसे कम होती है खेती की लागत?
धान की खेती को अच्छी बढ़वार के लिए बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन की जरूरत होती है, जिसे किसान आमतौर पर यूरिया के जरिए पूरा करते हैं. अजोला प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है, जिससे यूरिया और अन्य रासायनिक उर्वरकों की जरूरत 25 से 30 प्रतिशत कम हो सकती है. इससे खाद पर होने वाला खर्च कम होता है और खेती ज्यादा लाभकारी बनती है. इसके अलावा रासायनिक खादों के लगातार उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है. वहीं अजोला मिट्टी में जैविक कार्बन और पोषक तत्व बढ़ाने में मदद करता है. इससे मिट्टी की और उर्वरता बेहतर होती है और लंबे समय तक उत्पादन क्षमता बनी रहती है.
खरपतवार की समस्या और पशुपालन में भी उपयोगी
अजोला पानी की पूरी सतह को ढक लेता है. इससे सूर्य की रोशनी नीचे तक पहुंच नहीं पाती और खरपतवार की वृद्धि कम हो जाती है. इसके परिणामस्वरूप किसानों को निराई-गुड़ाई पर कम खर्च करना पड़ता है और श्रम लागत में भी कमी आती है. अजोला में 20 से 30 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है. यही कारण है कि इसे पशुओं के लिए पौष्टिक चारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. कई किसान धान की खेती के साथ-साथ पशुपालन में भी इसका उपयोग कर एक्स्ट्रा लाभ कमा रहे हैं.
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लेखक के बारे में
सुभाष पांडेय एक सीनियर और अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें मीडिया क्षेत्र में 32 वर्षों का समृद्ध अनुभव है। अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने समाचार लेखन, संपादन और रिपोर्टिंग के विभिन्न आयामों में कार्य करते हुए पत्रकारिता को मजबूत दिशा दी है।
