जब हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों के अभिजात वर्ग के बच्चे मदरसा जाते थे

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश की योगी सरकार गैर मान्यता प्राप्त मदरसों का 12 पॉइंट सर्वे कर रही है। यूपी के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री दानिश आजाद अंसारी (Danish Azad Ansari) की मानें, तो सरकार ने यह कदम मदरसों की स्थिति को सुधारने के लिए उठाया है। आदेशानुसार सर्वे को 15 अक्टूबर तक पूरा कर, 25 अक्टूबर तक शासन को रिपोर्ट उपलब्ध करानी है। राज्य सरकार की इस कवायद के कारण एक बार फिर मदरसों के इतिहास और वर्तमान पर चर्चा हो रही है।

क्या होता है मदरसा?
सबसे आसान भाषा में कहें तो मदरसा का अर्थ होता है- पढ़ने-पढ़ाने का स्थान यानी पाठशाला। किसी भी दूसरे सरकारी/प्राइवेट शैक्षणिक संस्थान की ही तरह मदरसा भी होता है। जिस तरह स्कूल अलग-अलग होते हैं, उनकी प्रार्थनाएं अलग-अलग होती हैं, उसी तरह मदरसे भी कई तरह के होते हैं।
मदरसों को आम तौर पर इस्लामी कानून और धर्मशास्त्र की शिक्षा देने के लिए जाना जाता है। लेकिन इतिहास बताता है कि मदरसों में अर्थमेटिक, अकाउंटेंसी, जमेट्री आदि की तालीम भी दी जाती रही है। कई मदरसों में आज भी विज्ञान, गणित और अंग्रेजी जैसे विषयों को पढ़ाया जाता है।

UNESCO ने अपनी वेबसाइट पर मदरसों को शिक्षा और संस्कृति का सार्वभौमिक केंद्र बताया है। 7वीं शताब्दी में बनी मदीना मस्जिद को मुस्लिम जगत का पहला शिक्षण संस्थान माना जाता है। इस मस्जिद को पैगंबर मोहम्मद ने बनवाया था। 10वीं शताब्दी में मदरसे मस्जिदों से अलग स्वतंत्र संस्थानों के रूप में उभरे। कुछ रिपोर्ट्स में पैगंबर को ही दुनिया पहला मदरसा चलाने का श्रेय दिया गया है।

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भारत में मदरसों की शुरुआत
UNESCO भारत में मदरसे की शुरुआत तेरहवीं शताब्दी बताता है। उदाहरण के रूप में ग्वालियर का मदरसा पेश किया जाता है, जिसकी स्थापत्य संरचना कुछ बौद्ध विहारों से मिलती जुलती है। एक अन्य रिपोर्ट में भारत में मदरसे की शुरुआत 1192 ई बताया गया। मुगल काल में मदरसों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। अकबर के शासन काल में मदरसों को धर्मनिरपेक्ष बनाया गया। इससे गैर-मुस्लिम समुदाय के बच्चों ने भी वहां दाखिला लिया। अकबर ने ही फारसी को मुगलों की राजकीय भाषा बनाई थी।

बाद में फारसी का प्रभाव इतना बढ़ गया कि सिख राजा महाराजा रणजीत सिंह ने भी इसे अपनी दरबारी भाषा बना लिया। गुरु नानक देव ने मदरसे में कम उम्र में ही फारसी सीख ली थी। गुरु गोबिंद सिंह ने अपने लेखन में फारसी का खूब प्रयोग किया है। द हिंदू की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि शिवाजी शुद्ध फारसी बोलते थे। उन्होंने अपने शासनकाल में फारसी और संस्कृत के एक शब्दकोश के संकलन का भी आदेश दिया था। 19वीं सदी के बंगाल के अभिजात वर्ग द्विभाषी थे। वे फारसी और बंगाली बोलते थे।

एक समय ऐसा भी था, जब हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों का अभिजात वर्ग अपने बेटों को शिक्षित होने के लिए मदरसा भेजा करता था। समाज सुधारक राजा राम मोहन राय, भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, भारतीय संविधान के निर्माताओं में से एक सच्चिदानंद सिन्हा, कहानी और उपन्यास सम्राट प्रेमचंद आदि ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मदरसों से ही प्राप्त की थी।

राजा राम मोहन राय अच्छी फारसी और अरबी जानते थे। उन्होंने एक फारसी अखबार में संपादन और लेखन का काम भी किया था। 1835 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अंग्रेजी लागू किए जाने तक फारसी ही आधिकारिक भाषा हुआ करती थी। प्रेमचंद ने अपनी कई कहानियों को पहले उर्दू में लिखा था, जिसका बाद में उन्होंने ही हिंदी अनुवाद किया। यह सब भारत में चलने वाले मदरसों का प्रभाव था।

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19वीं शताब्दी के अंत तक मदरसों में धर्मनिरपेक्ष परंपराएं का पालन हुआ। 1866 में दारुल उलूम देवबंद की स्थापना के बाद से धीरे-धीरे मदरसों को इस्लामी शिक्षा तक सीमित किया जाने लगा। हालांकि इसमें बहुत वक्त लगा। दारुल उलूम देवबंद की स्थापना मोहम्मद कासिम नौतनवी ने की थी। नौतनवी 18वीं सदी के इस्लामी स्कॉलर शाह वलीउल्लाह देहलवी से प्रभावित बताए जाते हैं।

सच्चर कमेटी और मदरसा
भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति की पड़ताल के लिए साल 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक कमेटी बनाई थी। सात सदस्यीय इस कमेटी की अध्यक्षता दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर ने की थी। कमेटी की रिपोर्ट ‘सच्चर कमेटी की रिपोर्ट’ के नाम से चर्चित है।

इस कमेटी ने मदरसों से जुड़े कई मिथकों को तोड़ा था। रिपोर्ट ने इस धारणा को दूर करते हुए कि मुस्लिम बड़ी संख्या में मदरसों में जाते हैं, बताया था कि स्कूल जाने वाले मुस्लिम बच्चों में से सिर्फ 3 से 4 फीसदी ही मदरसों में जाते हैं। रिपोर्ट ने बताया था कि मुस्लिम माता-पिता मुख्यधारा की शिक्षा या अपने बच्चों को सस्ते सरकारी स्कूलों में भेजने के खिलाफ नहीं हैं।

इसके अलावा रिपोर्ट ने मदरसा और मकतब के बीच अंतर करने का भी सुझाव दिया था। मदरसे से इतर मकतब ऐसा स्कूल होता है, जो मस्जिद से जुड़ा होता है। यानी उसके पड़ोस में होता है। मकतबों को उन मुस्लिम परिवारों द्वारा आवश्यक के रूप में देखा जाता है जो ‘मुख्यधारा’ के स्कूलों को उर्दू का अपर्याप्त ज्ञान प्रदान करने के रूप में देखते हैं। इस तरह मकतब का इस्तेमाल औपचारिक शिक्षा संस्थाओं में पढ़ने वाले बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने के लिए किया जाता है। कुरान पढ़ने के लिए फारसी लिपि का ज्ञान आवश्यक होता है। मकतब में छोटे बच्चों को मुख्य रूप से फारसी पढ़ना ही सिखाया जाता है।

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मदरसों को लेकर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में लिखा है:
ऐसे उपाय खोजने की कोशिश करनी चाहिए जिससे कि मदरसों को उच्च स्तर के शैक्षणिक बोर्ड से जोड़ा जा सके। इससे मदरसों में पढ़े छात्रा वहां से निकल कर मुख्यधारा की शिक्षा में आ सकेंगे। मदरसे के सर्टीफिकेट डिग्रियों को ‘बराबरी’ का दर्जा देने की व्यवस्था की जाए जिससे उच्चतर शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला मिल सके। मदरसों की डिग्रियों को प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे कि सिविल सेनाओं, बैंकों, सुरक्षा सेवाओं और ऐसी ही अन्य परीक्षाओं के लिए योग्यता के रूप में मान्यता देना चाहिए।