10 साल हो गए, लेकिन रोहित का सवाल आज भी ज़िंदा है। क्या इस देश में सपने देखने का हक़ सबको बराबर है?
आज रोहित वेमुला को गए 10 साल हो गए। लेकिन उनका सवाल आज भी हमें बेचैन करता है।
रोहित आगे बढ़ना चाहता था, सीखना चाहता था। लेकिन एक दलित का आगे बढ़ना व्यवस्था को मंज़ूर नहीं था।
आज भी दलित छात्रों को तिरस्कार और अलगाव झेलना पड़ता है। क्योंकि जाति आज भी सबसे बड़ा एडमिशन फ़ॉर्म है।
इसीलिए रोहित वेमुला एक्ट ज़रूरी है। ताकि कैंपस में भेदभाव अपराध बने, पहचान सज़ा न बने।
यह लड़ाई सिर्फ संसद की नहीं है। यह लड़ाई कैंपस, युवाओं और इंसाफ़ की है।
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