अगर ये न होते, तो क्या असम भारत का हिस्सा होता? 🤔
6 जून 1890 को जन्मे गोपीनाथ बोरदोलोई को आज असम का "लोकप्रिय" नेता कहा जाता है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी लड़ाई अभी बाकी थी...
6 जून 1890 को जन्मे गोपीनाथ बोरदोलोई को आज असम का "लोकप्रिय" नेता कहा जाता है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी लड़ाई अभी बाकी थी...
1922 में उन्होंने वकालत छोड़ राजनीति का रास्ता चुना। असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और अंग्रेजों ने उन्हें जेल भेज दिया। लेकिन संघर्ष उनकी पहचान बन चुका था।
1938 में असम के प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री) बने। उन्होंने किसानों को राहत दी, भूमि कर खत्म किया और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई साहसी कदम उठाए।
विभाजन के समय मुस्लिम लीग असम को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल करना चाहती थी। बोरदोलोई ने इसका डटकर विरोध किया। कहा जाता है कि उनकी दृढ़ता ने असम का भविष्य बदल दिया।
आजादी के बाद उन्होंने लाखों शरणार्थियों के पुनर्वास का काम संभाला। 1950 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत अमर रही।
"उन्होंने सिर्फ राजनीति नहीं की, असम का इतिहास बदल दिया"