कानून से ऊपर नहीं हो सकते पुलिस अधिकारी: हाईकोर्ट सख्त

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प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा एक व्यक्ति को 24 घंटे तक अवैध रूप से हिरासत में रखने पर सख्त कदम उठाया है. कोर्ट ने कहा कि प्रयागराज के हंडिया थाना क्षेत्र में एक व्यक्ति को पुलिस ने बिना कानूनी अधिकार के 24 घंटे तक हिरासत में रखा, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है.

अदालत ने राज्य सरकार को पीड़ित को 25 हजार रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये वाद व्यय (कॉस्ट) देने का निर्देश दिया है. साथ ही सरकार को यह राशि संबंधित पुलिस अधिकारी से वसूलने की स्वतंत्रता भी दी है. न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने मतांबर मिश्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया.

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क्या था मामला
याचिकाकर्ता मतांबर मिश्र का कहना था कि 26 नवंबर 2022 को वह अपने पैतृक गांव सिधवार (हंडिया, प्रयागराज) स्थित घर पर थे. आरोप है कि तत्कालीन चौकी प्रभारी बरौत, सूर्य प्रकाश दुबे उन्हें घर से जबरन उठाकर पहले पुलिस चौकी और फिर हंडिया थाने ले गए. याचिकाकर्ता के अनुसार उन्हें 26 नवंबर से 27 नवंबर 2022 तक करीब 24 घंटे लॉकअप में रखा गया और रिहाई के लिए 20 हजार रुपये रिश्वत की मांग की गई.

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याचिका में यह भी कहा गया कि इस संबंध में मुख्यमंत्री, डीजीपी और पुलिस आयुक्त प्रयागराज से शिकायत की गई, लेकिन पुलिस जांच में शिकायत को खारिज कर दिया गया.

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घरेलू विवाद में 107/116 की कार्रवाई को बताया गलत
मामले में पुलिस ने बाद में याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 107/116 सीआरपीसी की कार्यवाही शुरू की थी. हाईकोर्ट ने कहा कि विवाद मूल रूप से घरेलू प्रकृति का था और ऐसे मामले में शांति भंग की आशंका संबंधी कार्यवाही लागू नहीं होती. कोर्ट ने कहा कि अध्याय-8 की कार्यवाहियां सार्वजनिक शांति एवं लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए हैं, न कि घरेलू विवादों के समाधान के लिए.

कोर्ट ने ने यह भी कहा कि संबंधित प्रशासनिक अधिकारी ने अपने हलफनामे में स्वीकार किया कि घरेलू विवाद के पहलू पर विचार नहीं किया गया था और इसके लिए बिना शर्त क्षमा याचना की है. कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी सूर्य प्रकाश दुबे ने अपने जवाबी हलफनामे में याचिकाकर्ता को 26 से 27 नवंबर 2022 तक हिरासत में रखने के आरोप का स्पष्ट खंडन नहीं किया.

अदालत ने कहा कि इतने विशिष्ट आरोपों का स्पष्ट खंडन न होने की स्थिति में अवैध हिरासत का तथ्य स्वीकार किया हुआ माना जाएगा. अदालत ने यह भी कहा कि यदि मामला केवल घरेलू हिंसा की शिकायत का था तो पुलिस को उसमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं था, जब तक कोई संज्ञेय अपराध न बनता हो. ऐसे मामलों का उपचार घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत उपलब्ध है.

हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
फैसले में अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारी किसी घरेलू शिकायत के आधार पर याचिकाकर्ता को घर से उठाकर चौकी और फिर थाने ले गया तथा 24 घंटे तक लॉकअप में रखा. यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का खुला उल्लंघन है. जबकि बाद में शुरू की गई धारा 107/116 की कार्यवाही अवैध हिरासत को वैध ठहराने का प्रयास प्रतीत होती है.

खंडपीठ ने कहा कि नागरिकों की स्वतंत्रता का संरक्षण न्यायालय का दायित्व है और पुलिस अधिकारी कानून से ऊपर नहीं हो सकते. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को राज्य की ओर से अवैध हिरासत के लिए 25,000 रुपये का अंतरिम मुआवजा तथा 10,000 रुपये वाद व्यय दिया जाए. यह राशि आदेश की प्रति प्राप्त होने के 30 दिन के भीतर अदा की जाएगी. साथ ही राज्य सरकार चाहे तो यह पूरी रकम संबंधित पुलिस अधिकारी सूर्य प्रकाश दुबे के वेतन या अन्य देयकों से वसूल सकती है. हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को अलग से दीवानी वाद दायर कर अधिक क्षतिपूर्ति का दावा करने की भी छूट दी है.

फैसले में खंडपीठ ने कहा कि सरकार की नीतियों और न्यायालय के निर्देशों के बावजूद कई अधिकारी पुरानी कार्यप्रणाली नहीं छोड़ते. ऐसे मामलों में जब कोई नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत आता है, तब न्यायालय का कर्तव्य है कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रभावी रूप से लागू कराए.

 

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