साहिर के मोहल्ले में साहिर की दास्तां, चुटकुलों पर हंसे तो इन…

मुंबई। अवध के इलाके में किस्सागोई घुट्टी में मिलती है। हर तीज त्यौहार की अपनी कहानियां हैं। बच्चों को सुनाने की कहानियां अलग हैं। कुछ असल और कुछ बस उसी वक़्त सोची हुई। बड़े होकर कहानियां (stories) सुनने का वक्त नहीं मिलता और जो बड़ों को बहला सके, ऐसी किस्सा अवध के इलाके में किस्सागोई घुट्टी में मिलती है। हर तीज त्यौहार की अपनी कहानियां हैं। बच्चों को सुनाने की कहानियां अलग गोई आसान भी नहीं है। इस मामले में हिमांशु और प्रज्ञा दाद के हकदार हैं कि बीती शाम साहिर लुधियानवी की जो दास्तां उन्होंने यहां मुंबई के आराम नगर स्थित ‘स्लम्स ऑफ बॉलीवुड’ में मिलकर सुनाई, उसने पूरी महफिल को पूरे एक घंटे तक अपने जादू से बांधे रखा।

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साहिर को लोग एक बेहतरीन शायर और गीतकार के रूप में जानते हैं। लेकिन, ये दास्तां बताती है कि बचपन से लेकर अपने आखिरी वक्त तक साहिर ने जिंदगी को एक आम इंसान जैसे ही जिया। कभी शोहरत का मुखौटा लगाकर तो कभी उस मुखौटे की तलाश में जो उन्हें फिर से अपनी अम्मी की गोद में खेला अब्दुल हई बना दे।

इसलिए रखा गया नाम अब्दुल (abdul) हई
‘दास्तान ए साहिर’ सुनाने वाले हिमांशु बाजपेयी और प्रज्ञा शर्मा की किस्सागोई में एक खास तरह की तरलता है। वह सामने बैठे श्रोताओं से लगातार संवाद बनाए रखते हैं। ये किस्सागोई वहां से शुरू होती है जब साहिर के वालिद ने उनका नाम अब्दुल (abdul) हई सिर्फ इसलिए रखा कि ये उनके उस पड़ोसी का नाम था जिससे उनकी अदावत चलती थी। पड़ोसी को गरियाने के लिए बेटे का नाम जो यूं रखा तो बेटा कभी बाप के सीने से लिपट नहीं पाया। मां के कलेजे का वह टुकड़ा था और जो लिखता था तो उसमें भी कलेजा निकालकर रख देता था। साहिर की शुरुआती शोहरत, फिर मुंबई आकर यहां वहां धक्के खाने से लेकर ये दास्तान उस कालखंड को तफ्तील से सुनाती है जब साहिर हिंदी फिल्म जगत के नंबर वन गीतकार बन गए।

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