धर्म का उतना प्रयोग करे जितना बहुत ज़रूरी हो

धर्म का उतना प्रयोग करे जितना बहुत ज़रूरी हो

आदित्य धीमान

आपको यदि सामाजिक सम्मान भागीदारी अधिकार बराबरी का दर्जा चाहिए तो जीवन में धर्म का उतना प्रयोग करे या उतनी अहमियत दे जितना बहुत ज़रूरी हो क्योंकि देखा यह जा रहा है कि धर्म के प्रति बहुत ज़्यादा भावुक होने के कारण वंचित वर्ग की सामाजिक आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे ख़राब हो रही है और कुछ समय बाद शैक्षिक स्थिति भी ख़राब हो सकती है बहुत ज़्यादा धर्मावलंबी होकर हम ख़ुद को ही निम्न बना रहे हैं और स्वीकार कर रहे हैं धर्म ग्रन्थ मानव रचित है या ईश रचित यह इसी से सिद्ध हो जाता है कि धार्मिक साहित्य में बहुत सारी बातें परस्पर विरोधी है और अपने पूज्य देवी देवताओं को भी आरोपित किया गया है तो इसी से पता चलता है कि इन धर्म ग्रन्थो को लिखने वालो की मानसिकता किस तरह की रही होंगी समझ से परे है मनोरंजन परोसने का कुप्रयास किया गया है और यदि इन अप्रासंगिक बातों का कोई विरोध करता है तो उसे नास्तिक या धर्म विरोधी का तमगा दे दिया जाता है जब आप ही अपने धर्म ग्रन्थो मे फ़िज़ूल की सामग्री भरेंगे तो दूसरों को तो स्वत ही आलोचना का मौक़ा मिल जाता है शायद इसीलिए स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने वेदो को छोड़कर बाकी धर्म ग्रन्थों को विशेष महत्व नहीं दिया ।

पुरानी पीढ़ी से हर अगली पीढ़ी अग्रणी होती है हम यह पिछली दो तीन शताब्दियों से तो साक्ष्य सहित देख रहे हैं तो फिर क्यों हम हज़ारों साल पहले जाते हैं क्या अपनी योग्यता क्षमता पर हमे भरोसा नहीं है ।यदि आगे बढना है तो धर्म पर निर्भरता कम कर तर्क चिंतन मनन विश्लेषण पर निर्भरता बढानी होगी और धर्म के जंजाल में फंसे रहेंगे तो नकली ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य बनने की कोशिश करते रहेंगे और ये वर्ग आपको स्वीकारेंगे नहीं ।इसलिए पूर्व के अनुभवो से सीख लीजिए और वैज्ञानिक युग में समय काल प्रस्थितियों के अनुसार सोच बदलिए क्रियाकलापों को बदलिए समय ख़राब करते रहने का कोई लाभ नहीं है आज नहीं तो कल कल नहीं तो परसों तार्किक ही बनना पड़ेगा जब संघ प्रमुख मोहन भागवत जी कहते हैं कि जातियाँ पण्डितो ने बनायी है तो वे बहुत कुछ कह जाते हैं इस वक्तव्य के अनेक निहित अर्थ है ।

 

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‘तरुणमित्र’ श्रम ही आधार, सिर्फ खबरों से सरोकार। के तर्ज पर प्रकाशित होने वाला ऐसा समचाार पत्र है जो वर्ष 1978 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जैसे सुविधाविहीन शहर से स्व0 समूह सम्पादक कैलाशनाथ के श्रम के बदौलत प्रकाशित होकर आज पांच प्रदेश (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तराखण्ड) तक अपनी पहुंच बना चुका है। 

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