'इंडिया शाइनिंग' जैसा न हो 'अबकी बार, 400 पार' का हश्र

दस साल का अंतर: बदले बदले से मोदी, थके- थके से कार्यकर्त्ता 

'इंडिया शाइनिंग' जैसा न हो 'अबकी बार, 400 पार' का हश्र

* भाजपा के पास जोशीले नारों का अभाव, राहुल ही मोदी के भाषणों के केन्द्र में * लगातार तीसरे चुनाव में भी मोदी के मुद्दे कांग्रेस से हिन्दू मुस्लिम तक सीमित * इस बार राहुल मोदी के मुकाबले अधिक मुखर 

नई दिल्ली। 2004 के आम चुनाव में अटलबिहारी वाजपेई की जगह लोकसभा चुनाव की कमान बिल्कुल उसी तरह रथयात्रा के शिल्पकार उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के हाथों में थी, जैसे आज नरेंद्र मोदी के है। आडवाणी भी रथयात्रा की सफलता के बाद भाजपा को 1984 की 2 सीटों के मुकाबले दो -दो बार सत्ता के नजदीक पहुंचा चुके थे और अटलबिहारी वाजपेई के पीएम बने होने के बावजूद संगठन और सत्ता में उनकी धाकड़ पकड़ थी। उनके शिल्पकार और सलाहकार प्रमोद महाजन ने इंडिया शाइनिंग का नारा देकर आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देख लिया। चुनावी रणनीति के अनुसार देश के हर चौराहे, गली-मुहल्ले को इंडिया शाइनिंग के पोस्टरों और बैनरों से पाट दिया गया था। इन पोस्टरों में अटल सरकार की स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी उपलब्धियां गिनाई गयी थीं। लेकिन जब चुनाव परिणाम आये तो भाजपा को मात्र 138 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस को 145 सीटें। इसके अलावा सीपीआईएम, डीएमके, समाजवादी पार्टी तथा राजद क्षेत्रीय ताकतें बनकर उभरीं और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए ने सरकार बना ली। 2024 के आम चुनाव को भी एक तरह से 2004 के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है, जहाँ नरेन्द्र मोदी केन्द्र में दिख रहे हैं। 2014 व 2019 के दो आम चुनावों में भी वे केन्द्र में थे, लेकिन 2024 से पहले नरेन्द्र मोदी ने खुद कभी अपने मुंह से यह मांग या दावा नहीं किया था कि अगली बार वो सरकार बनाना चाहते हैं या सरकार बनाने जा रहे हैं। यहां तक कि 2014 के चुनाव में पहली बार भाजपा को पूर्ण बहुमत से भी अधिक सीट दिलानेवाले नरेन्द्र मोदी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वो अपना काम करते हैं, परिणाम की चिन्ता नहीं करते। लेकिन इस बार मोदी के व्यवहार में बदलाव दिख रहा है। पहली बार मंचों से वो खुद न केवल जनता से अपने लिए तीसरा कार्यकाल मांग रहे हैं बल्कि लगभग हर मंच से कांग्रेस के सत्ता में लौटने का डर भी दिखा रहे हैं। 2014 से 2024 में फर्क यह आया है कि मोदी के लिए जो बातें उनके समर्थक, उनका प्रचार तंत्र और उनकी पार्टी बोलती थी इस बार वो सारी बातें मोदी खुद बोल रहे हैं। मसलन पहली बार का नारा 'अबकी बार मोदी सरकार' हो या फिर दूसरी बार का नारा 'आयेगा तो मोदी ही' को खुद मोदी ने कभी मंच से नहीं दोहराया था। यह काम जमीन पर उनके समर्थक कर रहे थे। लेकिन अब तीसरे कार्यकाल के लिए जब वो चुनाव मैदान में हैं तब उनके समर्थकों में ही वह उत्साह नहीं दिख रहा है जो बीते दो चुनावों में दिखता था। मानो, समर्थकों ने भी मान लिया है कि जब मोदी अपनी योजना से चार सौ पार जा रहे हैं तो फिर उसको सक्रिय होने की क्या जरूरत है। अभी तक उत्तर भारत की जिन सीटों पर वोटिंग हुई है वहां मोदी चर्चा के केन्द्र में नहीं दिखाई दिये हैं। चुनाव के मुद्दे और चर्चाएं या तो हैं नहीं और अगर हैं भी तो स्थानीय हैं। 2014 के मोदी के प्रचार अभियान से इस बार एक और अंतर दिख रहा है कि वो अपना वह चुनावी एजेंडा सेट नहीं कर पाये हैं जिससे उनके समर्थकों और पार्टी वर्कर में जोश भर जाए। 'अबकी बार चार सौ पार' से उनके चुनावी अभियान की जो शुरुआत हुई वह मुस्लिम आरक्षण से होते हुए कांग्रेस, पाकिस्तान, चिट्ठी लिखकर हर बूथ पर कांग्रेस को हराने तक पहुंच गयी है। मोदी जो भी बोल रहे हैं या जो मुद्दे उठा रहे हैं उसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो नया हो। बीते दो चुनाव उन्होंने इन्हीं शब्दों के सहारे लड़ा था लेकिन तीसरी बार फिर से उन्हीं शब्दों को दोहराने से न तो विरोधियों को कोई खास फर्क पड़ रहा है और न ही समर्थकों में कोई उत्साह नजर आ रहा है। इस बार एक बात और गौर करने लायक है कि राहुल गांधी जहां स्वतंत्र रूप से मुद्दे उठा रहे हैं, वहीं मोदी या तो उन मुद्दों का जवाब देने की को़शिश कर रहे हैं या फिर पूरे चुनाव को राहुल बनाम मोदी करने का प्रयास करते दिख रहे हैं। राहुल गांधी इस बार ज्यादा मैच्योर तरीके से प्रचार अभियान में हैं और मजाक बनने से अब तक बचे हुए हैं। वो इस तरह से मुद्दा उठा रहे हैं कि खुद मोदी को जवाब देना पड़ रहा है। यह राहुल गांधी द्वारा उठाये गये सवाल का ही असर है कि ऐन चुनाव के बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू अयोध्या में रामलला का दर्शन करने पहुंच गयीं।

आखिरकार घूम फिरकर मोदी और भाजपा ने अपने सरकार की उपलब्धियां गिनाने की बजाय दस साल से सत्ता से बाहर बैठी कांग्रेस की नाकामियां गिनाना शुरु कर दिया है। वो कांग्रेस के सत्ता में लौटने का डर दिखा रहे हैं जिसकी फिलहाल 2024 में तो कांग्रेस को ही उम्मीद नहीं है। फिर भी चार सौ पार के जिस नारे से चुनाव अभियान की शुरुआत हुई थी वही भाजपा के गले की फांस बनता जा रहा है। अब अगर एनडीए को इससे कम सीटें आती है तो यही मोदी की हार घोषित हो जाएगी भले ही भाजपा-एनडीए को इतनी सीटें मिल जाएं कि वह सरकार बना ले।

बहरहाल, भाजपा के इस समय मुख्य रणनीतिकार अमित शाह का उत्साह कायम है और वो आज भी यही दावा कर रहे हैं कि 4 जून को जब मतगणना शुरु होगी उस दिन दोपहर 12 बजे तक एनडीए चार सौ का आंकड़ा पार कर लेगा। अब देखना यह होगा कि चार जून को भाजपा का इंडिया शाइनिंग वाला हाल होता है या सचमुच वह ऐतिहासिक जीत दर्ज करके सभी रिकार्ड तोड़ देती है।

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