चिंतन भावना और संवेदना की प्रतिमूर्ति हैं मां सरस्वती– कुमकुम सिंह

सरस्वती पूजा‌ बसंत पंचमी का असली सार

चिंतन भावना और संवेदना की प्रतिमूर्ति हैं मां सरस्वती– कुमकुम सिंह

सुल्तानपुर। बसंत ऋतु नवीनता का प्रतीक है नवीनता उल्लास को जन्म देती है उल्लास सुख समृद्धि का द्योतक है सुख शांति का वास ज्ञान में है। बसंत पंचमी ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता सरस्वती का अवरतण इसी दिन हुआ था। साहित्य संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की पूजा अर्चना इस दिन की जाती है। साहित्य बिना चिंतन के नहीं लिखा जा सकता है संगीत बिना भावना के असंभव है और  कला बिना संवेदना के साहित्य संगीत कला क्रमशः भावना और संवेदना की प्रतिमूर्ति है। मां सरस्वती में चिंतन भावना और संवेदना का समन्वय है बसंत पंचमी के दिन ही पृथ्वी की अग्नि सृजनता की ओर अपनी दिशा करती है। यही वजह है कि ठंड में मुरझाए हुए पेड़ पौधे फूल आंतरिक अग्नि की प्रज्जवलित कर नए सृजन की तरफ बढ़ते हैं। बसंत ऋतु में पतझड़ की वजह से पेड़ पौधों पर नई कली खिलकर पुष्प बन जाती है। बसंत का मौसम सर्दियों के जाने का और गर्मियों के आने का संकेत देता है बसंत पंचमी के 40 दिन बाद होली का पर्व मनाया जाता है। यही वजह है कि बसंत पंचमी से होली के त्यौहार की शुरुआत मानी जाती है। मांगलिक और शुभ कार्य के लिए बसंत पंचमी का दिन काफी खास होता है देश के लगभग हर राज्य में पंचमी का पर्व अलग-अलग तरीके से मनाते हैं। इस दिन लोग मां सरस्वती की पूजा के दौरान पीले फल मिठाई और मीठे पीले चावल को भोग लगाते हैं क्योंकि मां सरस्वती को पीला रंग बेहद प्रिय है प्राचीन समय से ही बसंत का लोगों का मनचाहा मौसम रहा है। सनातन धर्म में बसंत पंचमी एक मुख्य पर्व है इस दिन दान करने का भी विशेष महत्व है कहा जाता है कि जो इस दिन विशेष चीजों का दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। ज्ञान रूपी सरस्वती ने अज्ञान रूपी अंधकार राक्षस को मारने  के लिए बसंत रूपी ऋतुको पैदा किया मां सरस्वती को अनेकों नाम से जाना जाता है जैसे शारदा वीणावादिनी,वीणापाणि, बागेश्वरी वाणी आदि। बसंत पंचमी माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है चंद्रमा की कला के बढ़ते एवं घटे कलाओं के आधार पर हिंदी महीने में दो पक्ष क्रमशः कृष्ण एवं शुक्ला होते हैं। शुक्ल पक्ष में चंद्र की कलाएं बढ़ती हैं कृष्ण पक्ष में घटती हैं चंद्र की बढ़ते कला  की पंचमी तिथि को शुक्ल पंचमी कहते हैं आत्मिक ज्ञान का आयाम अनंत है। आत्मिक ज्ञान की कोई परिसीमा नहीं होती है। ज्ञान का अस्तित्व भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान से है शारीरिक क्रिया द्वारा प्राप्त ज्ञान भौतिक है। आत्मिक क्रिया द्वारा प्राप्त ज्ञान आध्यात्मिक है। भौतिक ज्ञान जीवन यापन का साधन है और आत्मिक ज्ञान इह लौकिक और पारलौकिक के शक्तियों के विकास का साधन है आत्मिक ज्ञान में सूक्ष्मता होती है। सांसारिक ज्ञान में स्थूलता होती है जो दृश्य है वह स्थल है और जो अदृश्य है वह सूक्ष्म है।

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