42 साल बाद कांग्रेस में बड़ी टूट की आहट!

-कांग्रेस के 23 बड़े नेता जम्मू बैठक के बहाने खुलकर सामने आए
-पार्टी में विश्वसनीय नेतृत्व के अभाव से हैं खफा
-खुले तौर पर शीर्ष नेतृत्व पर लगाए आरोप

-चार दशक पूर्व  इंदिरा गांधी से खफा देवराज अर्स हुए थे अलग

हरिमोहन विश्वकर्मा
लखनऊ।  विश्वसनीय नेतृत्व का संकट झेल रही कांग्रेस जल्द ही विघटन की एक नई चुनौती का सामना करने जा रही है? जम्मू में जी 23 की बैठक पार्टी के लिए वाटरलू का मैदान बन सकती है? ये सवाल राजनीतिक फिजाओं में तेजी से तैर रहा है। ऐसा इसलिए समझा जा रहा है क्योंकि अब तक दबे- छुपे कांग्रेस में विश्वसनीय नेतृत्व के अभाव से खफा और पुरजोर तरीके से कांग्रेस की असफलताओं के लिए पूर्णकालिक अध्यक्ष के न होने को बड़ा कारण मान रहे कांग्रेस के 23 बड़े नेता जम्मू बैठक के बहाने खुलकर सामने आ गए हैं और खुले तौर पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर आरोप लगा दिए हैं। अब आगे बढ़ने से पहले हम अपने पाठकों को 42 साल पूर्व के घटनाक्रम में लिए चलते हैं जब एक दिग्गज कांग्रेसी क्षत्रप देवराज अर्स ने इंदिरा गांधी की नीतियों के खिलाफ अपनी पार्टी गठित कर ली और आज के अनेक दिग्गज कांग्रेसी उनके साथ हो लिए थे।
जी 23 के नेताओं की तरह ही 40 साल पहले राजनीतिक पत्र व्यवहार में ऐसी ही प्रतीकात्मक मगर उन्मुक्त भाषा के प्रयोग ने खलबली मचा दी और प्रेस ने इसे हाथोंहाथ उछाला। वो देवराज अर्स ही थे, अर्स रातोंरात देश भर में मशहूर होकर अपने मकसद में कामयाब रहे। देश भर में लोगों के भीतर कौतूहल जगा कि आखिर इंदिरा गांधी को इतने बिंदास अंदाज में चुनौती देने वाला कौन माई का लाल पैदा हो गया? इसके बाद अर्स की कांग्रेस से विदाई हुई तो वे अपने साथ उसके विधायक और राज्य सरकार को भी कांग्रेस एस में ले गए। उनके शामिल होने और अध्यक्ष बनने से वह अंतत: कांग्रेस यू हो गई। उनके साथ ए के एंटनी, केपी उन्नीकृष्णन, यशवंत राव चव्हाण, देवकांत बरुआ, ब्रह्मानंद रेड्डी, शरद पवार, शरत चंद्र सिन्हा, प्रियरंजन दास मुंशी आदि तत्कालीन कांग्रेस के बड़े नेता भी कांग्रेस यू में आ गए।  इतना बड़ा विभाजन कांग्रेस में न पहले कभी हुआ न आगे हुआ। राष्ट्रीय स्तर पर अर्स ने तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और हेमवतीनंदन बहुगुणा जैसे नेताओं से भी हाथ मिलाया। अलग बात है कि 80 में इंदिरा ने जबरदस्त वापसी की और  देवराज अर्स ने इसके बाद विपक्ष की राजनीति की। इस घटनाक्रम का उल्लेख इसलिए जरूरी था कि जी 23 में भी अनेक दिग्गज हैं जिनका कांग्रेस की राजनीत में उल्लेखनीय स्थान है और अगर वे पार्टी से छिटकते हैं तो पहले ही कमजोर पार्टी धराशाई हो जायेगी। इनमें गुलाम नवी सबसे बड़ा चेहरा है जो मुस्लिम राजनीति के न सिर्फ बड़े बल्कि विश्वसनीय चेहरे हैं और अहमद पटेल के जाने के बाद कांग्रेस में उनकी टक्कर का मुस्लिम चेहरा नहीं है। मिलिंद देवड़ा और जितिन प्रसाद ऊजार्वान और युवा चेहरे हैं जो पार्टी की भावी पूँजी है तो कई ऐसे चेहरे भी हैं जिन्हें फुंका कारतूस कहकर भले झुठला दिया जाए लेकिन आज भी उनकी विश्वसनीयता बाकी है। इनमें राजबब्बर, कपिल सिब्बल, संदीप दीक्षित, भूपिंदर हुड्डा, कुरियन, शशि थरूर, मुकुल वासनिक, रेणुका चौधरी, वीरप्पा मोइली, पृथ्वीराज चव्हाण, अरविंदर सिंह लवली, विवेक तन्खा, अखिलेश प्रसाद और मनीष तिवारी आदि की राजनीतिक क्षमताएं और अनुभव अगर कांग्रेस से अलग हुए तो कांग्रेस को भारी नुकसान होने तय है।

कांग्रेस की आज की स्थितियां 42 साल पहले से पूर्णत: अलग है। तब इंदिरा के कद्दावर नेतृत्व का सामना अर्स को करना था और आज का विद्रोह कद्दावर नेतृत्व की तलाश के बहाने हो रहा है। राहुल 2004 से लेकर अब तक नेतृत्व के मामले में हर पहलू में पिछड़ रहे हैं और पुत्र मोह के चलते सोनिया ने कोई दूसरा नेतृत्व पनपने नहीं दिया। यहां तक कि प्रियंका गांधी के राजनीतिक रूप से राहुल के 21 बैठने की कई घटनाएं भी सोनिया का राहुल मोह तोड़ नहीं पा रही, फिर गैर गांधी परिवार के नेताओं की बिसात ही क्या। इसी फेर में ज्योतिरादित्य की विदाई हुई और सचिन पायलट को किसी तरह रोका गया। अब ऐसे में राजनीतिक जानकार कांग्रेस के टूटने की आहट सूंघ रहे हैं तो इसके कारण और संकेत भी साफ दिख रहे हैं। बड़ी दिक्कत ये है कि सोनिया गांधी ने इस मामले में पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। वजह शायद वही है-राहुल की ताजपोशी का मोह। ऐसे में कांग्रेस में एका बनी रहती है तो ये एक बड़ा चमत्कार होगा, जो तभी संभव होगा जब सोनिया राहुल मोह छोड़ पार्टी की बेहतरी की सोचें या प्रियंका को आगे बढ़ाएं। कांग्रेस में परिवारवाद से उकताए जी 23 नेता प्रियंका को कितना स्वीकारेंगे ये एक अलग सवाल है जिस पर चर्चा अगली रिपोर्ट में करेंगे।

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