अमेरिका: भारतीय प्रोफेशनल्स पर संकट, वजह बने डोनाल्ड ट्रंप

इस समय अमेरिका समेत दुनिया के कई विकसित देशों में वीजा संबंधी नियमों में फेरबदल या उन्हें सख्त किए जाने की वजह से वहां रहकर काम कर रहे भारतीय समुदाय की मुश्किलें और चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। खासतौर से अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ‘बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन’ (अमेरिकी उत्पाद खरीदो और अमेरिकी लोगों की सेवाएं लो) नीति के तहत नई-वीजा संबंधी कठोरताओं के चलते भारतीय समुदाय का चिंतित होना लाजिमी है। हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने एच-4 वीजाधारकों के वर्क परमिट को खत्म करने की योजना को अंतिम रूप दिया है। इस आशय का पत्र अमेरिकी नागरिक एवं आव्रजन सेवा विभाग के द्वारा प्रकाशित किया गया है। एच-1बी वीजाधारकों के जीवनसाथियों को एच-4 वीजा दिया जाता है। इस नए बदलाव के बाद अब अमेरिका में यदि पति के पास एच-1बी वीजा है तो भी पत्नी को कार्य करने की अनुमति नहीं होगी। इसी तरह पत्नी के पास एच-1बी वीजा होने पर पति को वर्क परमिट नहीं मिलेगा।

60 हजार से अधिक पेशेवरों पर लटकी तलवार

माना जा रहा है कि इस कदम से अमेरिका में कार्यरत 60 हजार से अधिक पेशेवरों को अब आगे काम की अनुमति नहीं मिलेगी और वे बेरोजगार हो जाएंगे। गौरतलब है कि 2015 में अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में एच-1बी वीजा रखने वाले व्यक्ति के जीवनसाथी को वर्क परमिट देने का फैसला हुआ था। यह फैसला इस आधार पर हुआ था कि एच-1बी वीजाधारक उच्च गुणवत्ता वाले पेशेवर के साथ उसका जीवनसाथी भी अमेरिका में रहकर कार्य कर सकता है। इससे सर्वाधिक फायदा भारतीय पेशेवरों को हुआ। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद एच-1बी वीजा नियमों को कड़ा करने की कवायद शुरू हुई।

See also  प्रद्युम्न मर्डर केस: फिर से उलझी गुथ्थी, आरोपी छात्र ने कहा CBI हमको फंसा रही है

वित्त वर्ष 2019 के लिए दिए जाने वाले एच-1बी वीजा आवेदन का सीजन अप्रैल 2018 में पूरा हो गया है। एच-1बी वीजा की सख्त नीति के तहत लागू किए गए नए नियमों से अब अमेरिका में कार्यरत कंपनी को यह साबित करना पड़ा है कि एच-1बी वीजा के जरिए थर्ड-पार्टी साइट पर तैनात कर्मचारी के पास विशिष्ट पेशे में विशिष्ट व गैर-पात्रता वाला असाइनमेंट है। नई नीति के तहत थर्ड-पार्टी वर्कसाइट पर केवल काम की अवधि के लिए कर्मचारियों को एच-1बी वीजा जारी करने का प्रावधान है।

कम हो सकती है एच-1बी वीजा की अवधि

ऐसे में नए नियम के तहत जारी एच-1बी वीजा की अवधि तीन साल से भी कम हो सकती है। वीजा संबंधी इन नए नियमों से अमेरिका में भारतीय आइटी कंपनियों के थर्ड-पार्टी सप्लायर बेस को तगड़ा झटका लगा है। साथ ही ये नियम भारतीय कुशल पेशेवरों के लिए बेहद परेशानीजनक हैं। गौरतलब है कि भारत की आइटी कंपनियों के लिए 2017 में भी एच-1बी वीजा मंजूरी कम हुई है। अमेरिकी थिंक टैंक द नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका में वीजा नियमों में सख्ती के कारण वर्ष 2017 में भारतीय कंपनियों के लिए 8468 नए एच-1बी वीजा प्राप्त हुए।

यह संख्या वर्ष 2015 की तुलना में 43 फीसद कम है। न केवल अमेरिका, बल्कि दुनिया के कई और विकसित देशों में भी भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए वीजा संबंधी मुश्किलें बढ़ी हैं। ऑस्ट्रेलिया ने अपने यहां बढ़ती बेरोजगारी से निपटने के लिए 95,000 से अधिक अस्थाई विदेशी कर्मचारियों द्वारा उपयोग किए जा रहे वीजा कार्यक्रम को एक अप्रैल 2018 से समाप्त कर दिया। इन कर्मचारियों में ज्यादातर भारतीय हैं। इस कार्यक्रम को 457 वीजा के नाम से जाना जाता है।

See also  राज्य में दोबारा लॉकडाउन लगाया...

विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति

इसके तहत ऑस्ट्रेलिया में कंपनियों को उन क्षेत्रों में चार साल तक विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति थी, जहां कुशल ऑस्ट्रेलियाई कामगारों की कमी है। नए नियम का सबसे ज्यादा असर भारतीयों पर हो रहा है। इसी तरह पिछले कुछ महीनों में सिंगापुर, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड सहित दुनिया के कई देशों में उठाए गए संरक्षणवादी कदमों के तहत वीजा पर सख्ती के परिदृश्य से इन देशों में काम कर रहे भारतीय आइटी प्रोफेशनल्स की दिक्कतें लगातार बढ़ती गई हैं।

बहरहाल अमेरिका में चूंकि अभी एच-1बी वीजाधारक के जीवनसाथी को वर्क परमिट न देने का प्रस्ताव अंतिम चरण में है, ऐसे में कुशल पेशेवरों के लिए सख्त इस वीजा प्रस्ताव को वापस कराने हेतु अमेरिका में प्रतिष्ठित प्रवासी भारतीय मित्रों, भारत के शुभचिंतक अमेरिकी सांसदों और भारत की आइटी कंपनियों के हितों के लिए काम करने वाले संगठन नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेस कंपनीज (नैस्कॉम) द्वारा वैसे ही रणनीतिक प्रयास किए जाएं तो बेहतर है, जैसे एच-1बी वीजा नियमों में संशोधन प्रस्ताव वापस कराने हेतु किए गए थे। उस बदलाव से एच-1बी वीजा पर अमेरिका में रहकर ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे भारतीयों सहित अन्य देशों के आइटी विशेषज्ञों को बड़ा झटका लग सकता था।

नियमों में बदलाव से बढ़ेंगी मुश्किलें

अमेरिकी आइटी कंपनियों में काम करने वाले विदेशियों में से करीब 70 फीसद कर्मचारी भारतीय हैं, जिनकी अमेरिका के वीसा संबंधी नियमों में बदलाव से मुश्किलें बढ़ जातीं और उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ सकता था। इसके अलावा भारत के लिए सालाना 115 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा कमाने वाले आइटी सेक्टर पर जबर्दस्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता था। लेकिन अमेरिका में प्रतिष्ठित प्रवासी भारतीयों, भारत सरकार और नैस्कॉम जैसे संगठन के संयुक्त प्रयासों के चलते 9 जनवरी, 2018 को अमेरिकी सरकार ने एच-1बी वीजा नियमों में बदलाव के प्रस्ताव पर रोक लगा दी थी। इससे अमेरिका में कार्यरत करीब 7.5 लाख भारतीय आइटी प्रोफेशनल्स को बड़ी राहत मिली थी। ट्रंप प्रशासन ने उस वक्त तो एच-1बी वीजा नियमों में सख्ती को लेकर अपने कदम वापस खींच लिए थे, लेकिन अब उसने अपने अमेरिका फर्स्ट के एजेंडे के तहत वीजा प्रस्ताव रोकने संबंधी यह दूसरी तरह की कवायद की है।

See also  यूपी में भ्रष्टाचार और घोटाले रोकने को सीएम योगी ने तैनात किया "प्रहरी"

जीवनसाथी को वर्क परमिट नहीं

एच-1बी वीजाधारकों के जीवनसाथी को वर्क परमिट नहीं देने के प्रोफेशनल्स के हितों से जुड़े इस प्रस्ताव से अमेरिका को कदम पीछे हटाने के लिए मजबूर करने हेतु कारगर एवं सार्थक प्रयास जरूरी हैं। यह अच्छी बात है कि ट्रंप प्रशासन की इस नई पहल के खिलाफ अमेरिका की सिलिकॉन वैली से भी विरोधी सुर उठना शुरू हो गए हैं। फेसबुक, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट आदि ने संगठित रूप से अमेरिका की सरकार से कहा है कि अमेरिकी कार्यबल से एच-4 वीजाधारक हजारों कुशल पेशेवरों को हटाने की नई योजना को खारिज किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंच सकता है। भारत को अमेरिका सहित विकसित देशों द्वारा पेशेवर प्रतिभाओं पर लगाई जा रही वीजा संबंधी रोक का मुद्दा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भी जोरदार ढंग से उठाना चाहिए। आखिर जब डब्ल्यूटीओ के तहत सदस्य देशों के बीच पूंजी प्रवाह नियंत्रण मुक्त है तो अमेरिका सहित विकसित देशों में श्रम व प्रतिभा प्रवाह भी नियंत्रण मुक्त क्यों नहीं होना चाहिए।